क्यों बोये जाते हैं नवरात्रि में ज्वारें: इस प्राचीन परंपरा का क्या है रहस्य
संवाददाता
29 September 2025
अपडेटेड: 11:12 AM 0thGMT+0530
29 सितंबर 2025: नवरात्रि में ज्वारे बोने का महत्व
भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएँ जीवन के हर क्षेत्र से गहराई से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि, देवी शक्ति की उपासना का प्रमुख पर्व है, जिसे देशभर में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पर्व में नौ दिनों तक माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि की अनेक परंपराओं में से एक है – जवारे बोना। इसे कई स्थानों पर “हरियाली” भी कहा जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक, कृषि और ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
जवारे क्या हैं?
जवारे वास्तव में जौ या गेंहू के अंकुर होते हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन, यानी घटस्थापना या कलश स्थापना के समय मिट्टी से भरे पात्र में जौ के दाने बोए जाते हैं। इन पर प्रतिदिन जल छिड़का जाता है और इन्हें सूर्य प्रकाश तथा दीपक की आभा मिलती है। नौ दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरे-भरे पौधों का रूप ले लेते हैं। यही पौधे ‘जवारे’ कहलाते हैं।
धार्मिक महत्व:
माँ दुर्गा का आह्वान –
जवारे बोना धरती और प्रकृति की शक्ति का आह्वान है। इसे माता रानी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है।
उन्नति और समृद्धि का प्रतीक –
जितने हरे-भरे और सघन जवारे उगते हैं, माना जाता है कि घर में उतनी ही समृद्धि और खुशहाली आती है। यह भविष्य के अच्छे समय का सूचक है।
पवित्रता का प्रतीक –
पूजा के दौरान जवारे के पास दीपक, कलश और माँ दुर्गा की मूर्ति रखी जाती है। इस प्रकार ये पौधे सात्विक ऊर्जा को धारण करते हैं।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि:
प्राचीन भारत कृषि प्रधान समाज था। नवरात्रि के समय जब नई ऋतु का आगमन होता था, किसान जौ बोकर अपनी आने वाली फसल का अनुमान लगाते थे। यदि जवारे अच्छे अंकुरित होते तो उसे आगामी अच्छी फसल का संकेत माना जाता। धीरे-धीरे यह परंपरा धार्मिक आस्था से जुड़ गई और हर घर में जवारे बोने की परंपरा चल पड़ी।
ज्योतिषीय महत्व:
जौ को वैदिक ज्योतिष में गुरु (बृहस्पति ग्रह) का प्रतीक माना जाता है। बृहस्पति ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य का कारक है। नवरात्रि में जवारे बोने से गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। यही कारण है कि धार्मिक अनुष्ठानों में अक्सर जौ का विशेष महत्व बताया गया है।
क्षेत्रीय परंपराएँ:
मध्यप्रदेश और राजस्थान –
दशहरे के दिन लोग अपने कानों में जवारे लगाते हैं। इसे विजय और पुरुषार्थ का प्रतीक माना जाता है।
उत्तर भारत –
यहाँ जवारे को विजयादशमी पर नदी या तालाब में विसर्जित किया जाता है। यह देवी शक्ति को पुनः प्रकृति में विलीन करने का प्रतीक है।
ग्रामीण भारत –
गाँवों में जवारे बोना केवल धार्मिक नहीं बल्कि कृषि से भी जुड़ा हुआ है। लोग इसे नए मौसम की शुरुआत और खेतों की उर्वरता का संकेत मानते हैं।
पर्यावरणीय और वैज्ञानिक दृष्टि:
जवारे बोने की परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं है। इसका वैज्ञानिक महत्व भी है –
जौ का अंकुरण वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है और घर के वातावरण को शुद्ध करता है।
हरे-भरे जवारे मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
यह बच्चों को प्रकृति से जुड़ने और बीज से पौधा बनने की प्रक्रिया समझने का अवसर भी देता है।
दशहरे पर जवारे का विसर्जन:
नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजा के बाद विजयादशमी के दिन जवारे का विसर्जन किया जाता है। यह परंपरा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में हर शुरुआत का एक अंत होता है और हमें प्रकृति को उसका अंश लौटाना चाहिए। विसर्जन के समय कई लोग जवारे को प्रसाद के रूप में भी ग्रहण करते हैं, जिससे शक्ति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश:
जवारे का हरा-भरा रूप हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, यदि हम विश्वास और धैर्य रखें तो नया जीवन और नई ऊर्जा अवश्य प्राप्त होती है। यह हमारी आस्था और विश्वास का जीवंत प्रतीक है।
नवरात्रि में जवारे बोने की परंपरा धार्मिक आस्था, कृषि परंपरा, ज्योतिषीय मान्यता और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें माँ दुर्गा की शक्ति का स्मरण कराता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। हरे-भरे जवारे समृद्धि, शांति और सौभाग्य के प्रतीक हैं। दशहरे पर इनके विसर्जन के साथ ही हम यह सीखते हैं कि प्रकृति से लिया हुआ हमें पुनः उसी को समर्पित करना चाहिए।