मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व जो भारत की संस्कृति ,प्रकृति और विज्ञान तीनों को एक साथ जोड़ता है । मकर संक्रांति एक ऐसा दिन होता है जब सूर्य  धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है । इसी के साथ सूर्य की उत्तरायण यात्रा भी शुरू होती है । यानी दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और ठंड कम होने लगती है ।‌ इसीलिए मकर संक्रांति को खुशहाली नयी शुरुआत और फसल के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है ।


कैसे मनातें है मकर सक्रांति:
देश के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग-अलग नाम और अलग अलग तरीके है । कहीं इसे खिचड़ी कहा जाता है तो कहीं  पोंगल तो कहीं उत्तरायण तो कहीं माघ बिहू कहा जाता है ।
मकर संक्रांति में क्या करते हैं:

इस दिन तिल गुड़ का सेवन किया जाता है, पतंग उड़ाई जाती है। इस दिन नदियों में स्नान और दान पुण्य का विशेष महत्व होता है । कहा जाता है कि तिल गुड़ की मिठास रिश्तों में मिठास लाती है ।

तिथि में बदलाव क्यों? मकर संक्रांति 14 जनवरी या 15 जनवरी को:

अब सबसे बड़ा सवाल मकर संक्रांति 14 तारीख को होती है या फिर 15 को।  दरअसल मकर संक्रांति तिथि पर नहीं बल्कि सूर्य की चाल पर निर्भर करती है । जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है ,वही संक्रांति का समय होता है।
इसी वजह से हर साल समय में थोड़ा बदलाव होता है और कभी-कभी यह 14 जनवरी तो कभी-कभी 15 जनवरी को मनाई जाती है।  इस साल  2026 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही है । इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेगा।  इसीलिए यही मुख्य पर्व का दिन माना जाएगा।  तो देखा जाए तो मकर संक्रांति सिर्फ एक त्यौहार नहीं बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव ,सकारात्मक ऊर्जा और नई उम्मीदों का प्रतीक है ।

संक्रांति का अर्थ:
संक्रांति का अर्थ है जब सूर्य एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो यह प्रवेश काल संक्रांति कहलाती है।  दक्षिणायन से होते हुए उत्तरायण की तरफ सूर्य बढ़ते हैं और यह स्थिति संक्रांति का पर्व काल कहा जाता है । इस बार सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग भी बन रहा है।

खिचड़ी का दान:
मान्यता है मकर संक्रांति में हम चावल, मूंग की दाल की खिचड़ी का दान करते हैं।  तो अब सवाल उठता है कि मूंग की दाल और चावल की खिचड़ी के दान का क्या मतलब होता है । चावल को अन्न देव माना जाता है और मूंग की दाल इस ऋतु की पहली फसल होती है ।‌इस दृष्टि से देवताओं को यह दोनों ही वस्तुएं दान करनी चाहिए या अर्पित करना चाहिए ।‌अब देवता स्वयं आकर तो इसे ग्रहण नहीं कर सकते तो जो देवता स्वरूप में ब्राह्मण होते हैं, उन्हें हम दान कर सकते हैं । इसके दान करने से धन-धान्य ,पुत्र पौत्र की प्राप्ति होती है और वंश वृद्धि होती है।

तिल के दान का महत्व :
मकर संक्रांति में तिल का स्नान महत्वपूर्ण बताया जाता है मकर संक्रांति के प्रारंभ से ही सूर्य की जो गति बढ़ती है वह तिल तिल भर बढ़ती है । इस प्रकार से 6 माह का जो उत्तरायण का काल होता है उस कालखंड में सूर्य अपने चरम पर रहते हैं । इस दृष्टि से तिल का दान किया जाता है । जिससे हमारे परिवार को परिजनों को उन्नति प्राप्त हो ,धन-धान्य की प्राप्ति हो ,समृद्धि की प्राप्ति हो । जिस प्रकार सूर्य अपनी गति बढ़ाते हैं, इस तरह से हमारी पदोन्नति हो ,उन्नति हो, धन की गति बढ़े, सुख की गति बढ़े ,धर्म की गति बढ़े।


दान किसे करना चाहिए:
किसी योग्य ब्राह्मण या ब्राह्मणी को दान करना चाहिए इसके अलावा जो जरूरतमंद है , जो गरीब है ।जो बच्चे पढ़ाई करना चाहते हैं ,उन्हें किताब, कॉपी ,पुस्तक दान करना चाहिए