मध्य प्रदेश में पुलिस पर हमलों का कहर ज़ारी
संवाददाता
17 March 2025
अपडेटेड: 5:20 AM 0thGMT+0530
खतरे में कानून के रखवाले
क्या हमारा समाज धीरे-धीरे उन लोगों के खिलाफ मोर्चा खोल रहा है जो हमारी सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं? हाल ही में एमपी में पुलिसवालों पर हुए हमले की लिस्ट को देखा जाए तो यह सवाल मन में आता ही है। इस लिस्ट में एमपी के मऊगंज का नाम भी शामिल हो गया है। यहां शनिवार रात बवाल हो गया, जिसमें एक ASI और एक नागरिक की मौत हो गई।
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले का गड़रा गांव, जो कभी अपनी शांत पहचान के लिए जाना जाता था, अब एक ऐसी दर्दनाक घटना का गवाह बन गया है, जिसने कानून व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए। शनिवार को इस छोटे से गांव में हिंसा की ऐसी आग भड़की कि एक युवक और एक पुलिस अधिकारी की जान चली गई, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।
यह कहानी शुरू होती है एक आदिवासी परिवार और एक ब्राह्मण युवक के बीच हुए विवाद से, जो देखते ही देखते सामुदायिक संघर्ष में बदल गया। जब पुलिस ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो हालात और बेकाबू हो गए—पथराव, मारपीट और एक ऐसी त्रासदी, जिसने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया।
मध्य प्रदेश में पुलिसकर्मियों पर हमले की बढ़ती घटनाएं एक गंभीर सवाल खड़ा करती हैं। हाल ही में मऊगंज जिले के गदरा गांव में हुई दिल दहला देने वाली घटना इसका ताजा उदाहरण है। एक अपहरण की सूचना पर पहुंची पुलिस टीम पर भीड़ ने न सिर्फ पथराव किया, बल्कि इस हमले में एक एएसआई और एक नागरिक की जान चली गई। यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले एमपी में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं।
पिछले साल छतरपुर में थाने पर हमला हो या खरगोन में अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई के दौरान पुलिस पर डंडों से प्रहार, इसी तरह ग्वालियर में जुए की सूचना पर बदमाश ने ASI का सिर फोड़ दिया। भिंड में भी माफिया पुलिसवालों पर हमले कर देते हैं। इससे पहले शहडोल में भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। ये घटनाएं बताती हैं कि प्रदेश में कानून के रखवालों की राह आसान नहीं है।
इन घटनाओं को देखकर दो बातें सामने आती हैं। पहली, अपराधियों का बढ़ता दुस्साहस। छतरपुर में असामाजिक तत्वों ने संगठित रूप से थाने पर हमला किया। यहां तक कि थाने में आग लगाने की भी कोशिश की। भीड़ ने कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाने की कोशिश की।
दूसरी ओर, मऊगंज जैसी घटनाएं बताती हैं कि कई बार यह हिंसा स्थानीय समुदाय के गुस्से का परिणाम होती है। लोग पुलिस को अपने खिलाफ मानते हैं, खासकर तब जब मामला उनके निजी या सामुदायिक हितों से जुड़ा हो। लेकिन क्या यह गुस्सा जायज है? पुलिस अगर अपहरण जैसे अपराध को रोकने की कोशिश कर रही है, तो उस पर पत्थर बरसाना कहां तक सही है?
पुलिस की प्रतिक्रिया भी इस बहस का हिस्सा है। मऊगंज में हवाई फायरिंग और छतरपुर में मुख्य आरोपी का मकान ढहाना जैसे कदम बताते हैं कि पुलिस अब पीछे हटने के मूड में नहीं है। यह सख्ती जरूरी भी है, क्योंकि बिना डर के अपराधी और हिंसक भीड़ कानून को खिलवाड़ समझने लगते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या बुलडोजर हर समस्या का हल हैं? यह तरीका तात्कालिक राहत दे सकता है, पर लंबे समय में पुलिस और जनता के बीच की खाई को और चौड़ा कर सकता है। मकान ढहाने जैसी कार्रवाइयों को लेकर पहले भी सवाल उठे हैं।
पुलिसकर्मी भी इंसान हैं। मऊगंज में एक एएसआई की मौत और पिछले साल छतरपुर में घायल जवानों की खबरें बताती हैं कि यह पेशा कितना जोखिम भरा है। फिर भी, उनके पास सीमित संसाधन और कई बार अपर्याप्त प्रशिक्षण होता है। सरकार को चाहिए कि पुलिस को बेहतर उपकरण, भीड़ नियंत्रण के लिए प्रशिक्षण और मानसिक समर्थन दे।
मध्य प्रदेश में पुलिस पर हमले सिर्फ अपराध की घटनाएं नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक बीमारी का लक्षण हैं। यह बीमारी है अविश्वास, अशिक्षा और हिंसा को हल मानने की मानसिकता। इसे ठीक करने के लिए पुलिस को सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन बनाना होगा, वहीं सरकार और समाज को मिलकर जड़ तक जाना होगा। नहीं तो हर बार पत्थरों और गोलियों के बीच कोई न कोई जान गंवाता रहेगा – चाहे वह पुलिसकर्मी हो या आम नागरिक।