माघ मेला 2026 में क्या है खास:
आस्था की पावननगरी – संगम तट पर माघ मेला आरंभ: उमड़ा जनसैलाब
संवाददाता
4 January 2026
अपडेटेड: 4:29 PM 0thGMT+0530
संगम नगरी प्रयागराज में माघ मेला आरंभ:
प्रयागराज की पावन धरती पर इन दिनों आस्था का महासंगम देखने को मिल रहा है। संगम तट पर, पौष पूर्णिमा से माघ मेला आरंभ हो चुका है। कोहरे की धुंध में भी लाखों लोग जुट रहे हैं । कड़ाके की ठंड के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह में कोई कमी नहीं दिख रही। तड़के सूर्योदय से पहले ही संगम घाटों पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं । और हर तरफ “हर-हर गंगे” के जयघोष गूंजते रहते हैं। अद्भुत नजारा ,विहंगम दृश्य ,जिसे देखने के लिए धरती अंबर सात समंदर सभी लालायित होते हैं। देश के कोने कोने से ही नहीं विदेशों से भी लोग आते हैं। पूरे 44 दिनों तक चलने वाले इस मेले को 15 फरवरी महाशिवरात्रि तक मनाया जाएगा और इसी के साथ पौष पूर्णिमा से कल्पवासियों का व्रत भी आरंभ हो गया है। आचार्य चौक, दंडीवाड़ा, खाक चौक, तीर्थ पुरोहितों के शिविरों के साथ-साथ प्रमुख आध्यात्मिक संस्थाओं के जितने भी शिविर हैं ,सभी में आध्यात्म और सनातन की गूंज है।
सदियों पुरानी है परंपरा:
शनिवार से ही प्रथम पुण्य स्नान के साथ संगम तट पर आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला रहा है। माघ मेला सदियों पुरानी सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है। संगम की रेत पर बसी तंबुओं की नगरी में माघ मेले का शुभारंभ हो चुका है। मां गंगा पर आस्था रखने वाले लोगों का पवित्र डुबकी लगाने की सिलसिला जारी है।
माघ मेले की सुंदरता:
44 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक मेले के लिए संगम के घाट पूरी तरह तैयार हैं। मेला अवधि में 12 से 15 करोड़ श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आने की संभावना है जबकि करीब 20 लाख कल्पवासी तीन जनवरी से एक फरवरी तक कल्पवास करेंगे। श्रद्धालुओं और कल्पवासियों की सुरक्षा को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मेला क्षेत्र में 10 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। एंटी टेररिस्ट स्क्वायड की टीम ने भी मोर्चा संभाल लिया है। मेला क्षेत्र में 17 अस्थायी थाने और 42 पुलिस चौकियां स्थापित की गई हैं। व्यवस्था को दुरूस्त रखने के लिए माघ मेले को सात सेक्टरों में बांटा किया गया है। महाकुंभ मॉडल पर आधारित टेंट सिटी की तर्ज पर मेला क्षेत्र का विकास किया गया है। करीब 800 हेक्टेयर में फैले मेले में 126 किलोमीटर लंबे मार्ग चेकर्ड प्लेट से तैयार किए गए हैं। नावों पर एलईडी लाइट से सजी रंगीन छतरियां सजाई गईं हैं। संगम के जल में सात रंगों की रोशनी वाले फव्वारे लगाये गये हैं। और घाटों पर कलर कोडेड चेंजिंग रूम हैं । मेला परिसर में महाकुंभ के अनुभवों के आधार पर इस बार माघ मेले की तैयारियों का मॉडल तैयार किया गया है। संगम क्षेत्र को जोड़ने के लिए सात पांटून पुल बनाए गए हैं, जिससे श्रद्धालुओं की आवाजाही सुगम हो सके। हर साल माघ माह में प्रयागराज की पावन धरती पर संगम किनारे माघ मेले का आयोजन होता है।
धार्मिक मान्यताएं:
त्रिवेणी के तट पर लगने वाले इस माघ मेले से लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। कुंभ मेला 12 साल में चार स्थानों प्रयागराज, उज्जैन, नासिक और हरिद्वार पर लगता है। वहीं माघ मेला प्रयागराज में ही हर साल माघ महीने में लगता है प्रयागराज में लगने वाले माघ मेले का इतिहास और धार्मिक मान्यताएं भी हैं। प्रयागराज की ही वो धरती है जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम हुआ है। तीनों पवित्र नदियों के संगम की वजह से ही यहां स्नान-दान का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। माघ मेला में संगम में स्नान करने से व्यक्ति को अमृत फल प्राप्त होते हैं। कहते हैं कि 45 दिनों तक लगने वाले इस मेले में व्यक्ति दान, पुण्य कर के अपने पाप कर्मों से मुक्ति पा सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, माघ माह में गंगा स्नान करने से व्यक्ति जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ माह में स्नान-दान के अलावा पूजा-पाठ, यज्ञ, जप और होम का खास महत्व है। माघ माह में हर साल उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में संगम के किनारे रेत पर तंबू बनाकर कल्पवास करते हैं। शास्त्रों के जानकारों ने बताया है कि अळग अळग ग्रंथों में लिखा हुआ हैं कि माघ मेले की उत्पत्ति ब्रह्मांड की शुरुआत से जुड़ी है। प्राचीन हिंदू वेदों में “कल्प” को चार युगों में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के कुल वर्षों के बराबर अवधि का बताया गया है। और ये अवधि कई करोड़ वर्षों की होती है।
वैज्ञानिक कारण:
अब इसका विज्ञान तो हमारे और आपके ज्ञान से कहीं बहुत ऊपर है… ऐसा कहा जाता है कि श्रद्धापूर्वक “कल्पवास” करने से भक्त अपने पिछले जन्म के पापों से मुक्ति पाता है और जन्म-कर्म के चक्र से बाहर आ जाता है। यानि मुक्ति के मार्ग पर जाता है।
माघ मेले के प्रत्येक दिन, कल्पवासी को सूर्योदय के समय गंगा में स्नान करना होता है और उगते सूरज को प्रणाम करना होता है। और कल्पवासी दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं। 12 कल्पवास करने के बाद, कल्पवासी को अपना पलंग और अपनी सभी वस्तुएँ दान करनी होती हैं इस अनुष्ठान को “शय्या दान” कहा जाता है।
माघ मेले का इतिहास:
इतिहास में भी माघ मेले का वर्णन मिलता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तान्तों से पता चलता है कि सम्राट और राजपूत भी माघ मास में स्नान करते थे, जिसका प्राचीन महत्व बताया गया है। लेकिन ब्रिटिश काल में हालात बुरे थे। इस माघ मेले के दौरान अंग्रेज शुल्क वसूलते थे और और न देने पर स्नान नहीं करने देते थे। तो एक वो भी दौर था लेकिन अब योगी सरकार में माघ मेले की व्यवस्था चाक चौबंद हैं।
विशेष तिथियों के स्नान:
स्नान की जो प्रमुख दिन माने जाते हैं वो हैं पौष पूर्णिमा, मौनी पूर्णिमा मकरसंक्रांति, बसंत पंचमी और शिवरात्रि।
इन शुभ दिनों पर भारी भीड़ होती है।
.साधुसंतों का भी आगमन इन दिनों में ज्यादा होता है।
कहते हैं माघ मेले के समय में संगम के तट पर देवताओं का वास होता है, इसलिए इस समय विशेष तिथियों पर यहां स्नान करने से देवताओं की खास कृपा प्राप्त होती है । सूर्य-चंद्रमा की 14 कलाओं से लेकर संगम की आध्यात्मिक शक्ति की झलक संगम तट पर देखने को मिलती है जिसे देखने के लिए देवता स्वयं गंगा के घाटों पर उतरते हैं। और लाखों श्रद्दालु मुक्ति की आस में मां गंगा की रेत तक पहुंचते हैं।
तो माघ मेला का महत्व तब से है जबसे गंगा है….सनातन है….तीर्थराज प्रयागराज हैं….और हमारी आपकी आस्था है…