रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत: अब बनाएगा 1000 किलो का बम
संवाददाता
5 April 2026
अपडेटेड: 3:19 PM 0thGMT+0530
5 अप्रैल 2026
नई दिल्ली:
भारत रक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक क़दम उठाने जा रहा है. अब हमारे देश में ही वायुसेना के लिए सबसे घातक और भारी-भरकम बमों का निर्माण किया जाएगा. रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना की ताक़त बढ़ाने और रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ की तरफ़ एक बहुत बड़ा फ़ैसला लिया है.
मंत्रालय ने पूरी तरह से भारत में ही विकसित 1,000 किलोग्राम (लगभग 1 टन) वज़न वाले बमों के डिज़ाइन और विकास की प्रक्रिया शुरू कर दी है. ये बम इतने विनाशकारी होंगे कि इनकी क्षमता दुनिया भर में मशहूर ‘मार्क-84’ (Mk-84) श्रेणी के बमों के बराबर होगी.
क्या है इस फ़ैसले का महत्व?
अभी तक भारतीय वायुसेना इस श्रेणी के बमों के लिए मुख्य रूप से विदेशी निर्माताओं पर निर्भर है. वायुसेना की ताक़त को देखते हुए, यह उसकी सबसे बड़ी ख़ूबियों में से एक है. लेकिन, अब भारत सरकार ने रक्षा उत्पादों के लिए विदेशी निर्भरता को पूरी तरह से ख़त्म करने का फ़ैसला किया है. इस नई परियोजना का मुख्य उद्देश्य गोला-बारूद के निर्माण में देश को आत्मनिर्भर बनाना और हाई-कैपेसिटी (उच्च क्षमता) वाले बमों को देश में ही विकसित करना है.
वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इन स्वदेशी बमों में सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘बहुमुखी प्रतिभा’ (multirole capabilities) होगी. इसका मतलब है कि ये बम एक से ज़्यादा तरह के मिशनों में इस्तेमाल किए जा सकेंगे. इन बमों को वायुसेना के रूसी और पश्चिमी दोनों तरह के लड़ाकू विमानों में फ़िट किया जा सकेगा. यह युद्ध जैसी परिस्थिति में वायुसेना को बहुत बड़ा और निर्णायक फ़ायदा पहुँचाएगा.
कितनी होगी क्षमता और क्या होगा फ़ायदा?
यह नया बम 2,000 पाउंड (यानी लगभग 907 किलोग्राम) वज़न वाला होगा. यह ठीक वैसा ही होगा जैसे अमेरिका का ‘मार्क-84 BLU-117’ (Mark-84 BLU-117) बम. अमेरिका के इस बम का वज़न 2,000 पाउंड (यानी लगभग 907 किलोग्राम) है. ‘मार्क-84’ सीरीज़ का यह सबसे बड़ा बम है. इसकी शुरुआत वियतनाम युद्ध के दौरान हुई थी. उस समय यह अमेरिका के पास मौजूद तीसरा सबसे बड़ा बम था. नए और और भारी बमों के आने के बाद, अब यह वज़न के मामले में छठे स्थान पर आता है.
कैसे पूरा होगा यह प्रोजेक्ट?
वायुसेना को इन नए बमों की डिलीवरी करने का लक्ष्य सिर्फ़ ढ़ाई साल में रखा गया है. इस पूरी परियोजना को दो मुख्य चरणों में बाँटा गया है. पहले चरण में छह प्रोटोटाइप (नमूने) विकसित किए जाएँगे. विकास प्रक्रिया में यह नियम रखा गया है कि कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री स्वदेशी यानी पूरी तरह से भारत में बनी होनी चाहिए. रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का अनुमान है कि ‘रुचि की अभिव्यक्ति’ (ईओआई – Expression of Interest) जारी होने के बाद, अनुबंध पर हस्ताक्षर करने से लेकर स्वदेशी प्रोटोटाइप तैयार करने तक का समय तक़रीबन ढ़ाई वर्ष का होगा.
इन प्रोटोटाइपों का कड़ा परीक्षण किया जाएगा. इसमें यूज़र्स का ट्रायल और मूल्यांकन प्रक्रिया शामिल होगी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे वायुसेना की सभी ज़रूरतों को पूरा करते हैं. पूरी विकास प्रक्रिया पर वायुसेना ख़ुद बारीक़ी से नज़र रखेगी ताकि इसे भविष्य में बड़े पैमाने पर उत्पादन और इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा सके.
यह पूरी परियोजना ‘मेक-टू’ (Make-II) श्रेणी के तहत संचालित की जाएगी. ‘मेक-टू’ श्रेणी का मतलब है कि इस परियोजना को भारतीय रक्षा उद्योग (प्राइवेट या सरकारी कंपनियों) के द्वारा विकसित और डिज़ाइन किया जाएगा. इसका उद्देश्य रक्षा उत्पादों को स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित करना है. ‘मेक-टू’ के तहत इस परियोजना की पूरी फ़ंडिंग रक्षा मंत्रालय के द्वारा नहीं की जाती है, बल्कि यह उद्योग-फ़ंडेड (industry-funded) परियोजना होती है, जिसे मंत्रालय का समर्थन प्राप्त होता है.
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में यह फ़ैसला न सिर्फ़ वायुसेना की ताक़त बढ़ाएगा, बल्कि रक्षा क्षेत्र में भारत की ‘आत्मनिर्भरता’ को भी एक नई पहचान देगा. विदेशी निर्भरता को कम करने से देश को सुरक्षा और आर्थिक दोनों मोर्चों पर लाभ होगा. यह नए भारत की रक्षा तैयारियों और उसकी बढ़ती ताक़त का एक प्रतीक है.