राजकोट में 13 साल की रेप पीड़िता ने दिया स्वस्थ बच्ची को जन्म…

khabar pradhan

संवाददाता

19 May 2025

अपडेटेड: 9:14 AM 0thGMT+0530

राजकोट में 13 साल की रेप पीड़िता ने दिया स्वस्थ बच्ची को जन्म…

राजकोट में 13 साल की रेप पीड़िता ने दिया स्वस्थ बच्ची को जन्म,

33 हफ्ते की गर्भावस्था में कोर्ट ने दी थी अबॉर्शन की इजाजत

राजकोट में एक बेहद संवेदनशील और दुर्लभ मामले में 13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता ने रविवार को एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया. मासूम के साथ यह अपराध उसके ही चचेरे भाई और उसके दोस्त द्वारा किया गया था. गर्भावस्था की अवधि 33 हफ्ते पार कर चुकी थी, इसके बावजूद गुजरात हाईकोर्ट ने विशेष परिस्थितियों में अबॉर्शन की अनुमति दी थी. हालांकि मेडिकल जटिलताओं के चलते डॉक्टरों ने ऑपरेशन से डिलीवरी को ही सुरक्षित विकल्प माना.
यह देश का पहला मामला है जिसमें कोर्ट ने 33 सप्ताह की प्रेग्नेंसी में गर्भपात की इजाजत दी. इससे पहले 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने 32 हफ्ते की गर्भावस्था में ऐसी अनुमति दी थी. बच्ची एनीमिया से भी पीड़ित थी, जिससे उसकी जान को खतरा था.

पीड़िता का दर्दनाक सफर: परिवारिक रिश्तों ने ही तोड़ा भरोसा
13 वर्षीय पीड़िता महाराष्ट्र की रहने वाली है. उसकी मां का 2022 में तलाक हो गया था और बाद में उसने राजकोट निवासी एक व्यक्ति से शादी की थी. 27 अप्रैल 2025 को मां-बेटी महाराष्ट्र में एक रिश्तेदार के यहां गईं, जहां बच्ची ने पेट दर्द की शिकायत की. जांच में खुलासा हुआ कि वह 20 से 22 हफ्ते की गर्भवती है.
जब काउंसलर ने बच्ची से बात की, तो उसने बताया कि राजकोट में उसके चचेरे भाई साहिल (बदला हुआ नाम) और उसके दोस्त ने कई बार उसके साथ दुष्कर्म किया. बच्ची की मां ने महाराष्ट्र के जलगांव जिले के चालीसगांव थाने में मामला दर्ज कराया. बाद में केस राजकोट ट्रांसफर कर दिया गया.
जांच के दौरान सामने आया कि दोनों आरोपी भी नाबालिग हैं और उन्हें सुधार गृह भेज दिया गया है.

न्यायिक प्रक्रिया और मेडिकल चुनौती: कैसे कोर्ट ने संवेदनशीलता दिखाई
3 मई को पीड़िता के परिवार ने राजकोट की निचली अदालत में गर्भपात की अनुमति मांगी थी, लेकिन गर्भ 31 सप्ताह से ज्यादा का होने के कारण याचिका खारिज कर दी गई. इसके बाद परिवार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने तुरंत मेडिकल जांच के आदेश दिए और पंडित दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल की रिपोर्ट के आधार पर 12 मई को अबॉर्शन की अनुमति दी.
डॉक्टरों ने बताया कि बच्ची एनीमिया से पीड़ित थी और भ्रूण का वजन 1.99 किलोग्राम था. इन परिस्थितियों में आईसीयू, ब्लड सपोर्ट और विशेषज्ञ टीम की जरूरत थी. आखिरकार, सिजेरियन डिलीवरी के जरिए बच्ची का सुरक्षित प्रसव कराया गया.
एमटीपी एक्ट के तहत 24 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति होती है, लेकिन उससे अधिक गर्भ के मामलों में कोर्ट और मेडिकल बोर्ड की सलाह अनिवार्य होती है.

अब बच्ची की परवरिश की जिम्मेदारी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पास
बच्ची के जन्म के बाद उसका भविष्य अब चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) तय करेगी. यदि पीड़िता और उसका परिवार नवजात को पालने में असमर्थ रहता है, तो राज्य सरकार ‘चाइल्ड नीड एंड केयर प्रोटेक्शन’ एक्ट के तहत उसे शेल्टर होम में भेजेगी. ऐसे बच्चे “एक्सीडेंटली जन्मे” माने जाते हैं क्योंकि यह गर्भावस्था किसी आपराधिक कृत्य का परिणाम होती है, न कि मां की इच्छा से.
ब्रेस्टफीडिंग की व्यवस्था भी पीड़िता की सहमति से की जाएगी और भविष्य में बच्चे को गोद देने की प्रक्रिया भी चलाई जा सकती है.

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