सेहत से खिलवाड़:अब नकली जीरा करेगा लिवर किडनी खराब:
संवाददाता
1 February 2026
अपडेटेड: 12:24 PM 0stGMT+0530
सौंफ पर सीमेंट और रसायन लेप लगाकर बनाया जीरा, तीन पर केस:
खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले यूं तो आते ही रहते हैं। लेकिन ग्वालियर के बहोड़ापुर थाना क्षेत्र में मिलावट का गंभीर मामला सामने आया है। मिलावटखोर दाल और सब्जियों में तडका लगाने के काम आने वाले जीरे को भी नकली बना दिया। मिलावटखोरों ने सौंफ पर सीमेंट और रसायन का लेप लगाकर नकली जीरा तैयार किया। इसे बाजार में खपाने की तैयारी थी। पुलिस ने ऐसे तीन मिलावटखोरों पर एफआइआर दर्ज की है। पुलिस न ने बहोड़ापुर स्थित यूपी एमपी ट्रांसपोर्ट पर दाल बाजार के कारोबारियों और एक ब्रांड अधिकारी के साथ मिलकर 46 बोरी नकली जीरा जब्त किया।
इसकी कीमत करीब 3.25 लाख रुपए बताई जा रही है। मिलावटखोर इसे झांसी भेज रहे थे। नकली जीरे का खुलासा होने के बाद शनिवार को दाल बाजार व्यापार समिति ने व्यापारियों की बैठक बुलाई। उन्होंने व्यापारियों को ऐसा जीरा खरीदने और बेचने से मना किया है।
ऐसे पहचाने नकली जीरा :
हथेली पर थोड़ा जीरा लेकर मसलें। यदि काला रंग छोड़ दे तो मिलावट। असली जीरा रंग नहीं छोड़ता।
हल्की क्वॉलिटी का मिलावटी जीरा बिना पॉलिश और ग्रीडिंग का होता है, खुशबू नहीं होती।
मिलावटखोरों ने इसी ब्रांड का नकली जीरा बनाकर बाजार में खपाया
विलीप पंजवानी जो दाल बाजार व्यापार समिति के अध्यक्ष हैं ने
नकली जीरे को लेकर व्यापारियों की बैठक बुलाई। व्यापारियों को ऐसे उत्पाद खरीदने से मना किया है।
ऐसे खुली पोल: कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन भी:
दरअसल, शिकायतकर्ता हिमांशु कुमार पटेल ने पुलिस को बताया कि उनकी कंपनी के नाम और लेबल की हुबहू नकली पैकेट बनाए जा रहे हैं। इन पैकेटों में जीरे के साथ सीमेट और अन्य रासायनिक पदार्थ मिलाकर असली बताकर जीरा बेचा जा रहा है। इससे लोगों की सेहत को गंभीर खतरा हो सकता है। यह अवैध गतिविधियां 18 से 26 दिसंबर 2025 के बीच की गई। पुलिस ने मामले में हितेश सिंघल, मनोज मैनेजर, मां शीतला कोल्ड स्टोर, पुरानी छावनी व टीटू अग्रवाल निवासी झांसी तीनों पर कॉपीराइट अधिनियम में केस दर्ज किया।
ऐसे जीरे की कीमत भी आधी:
जीरा की वास्तविक कीमत 260-280 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। वहीं, मिलावटी जीरा 150-180 रुपए में ही मिलावटखोर खपा रहे थे। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबर यह है कि सस्ते जीरे को नामचीन ब्रांडों के कड़ों में भरकर पैकिंग की जा रही थी। इससे पहचान मुश्किल थी।