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19 मई 2026

नई दिल्ली:
भारत में रसोई गैस यानी एलपीजी की बढ़ती कीमतों और सप्लाई की चिंता से अब जल्द ही राहत मिल सकती है। पुणे के वैज्ञानिकों ने एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। देश में चल रहे ऊर्जा संकट के बीच वैज्ञानिकों ने एलपीजी के एक बेहतरीन और सस्ते स्वदेशी विकल्प की खोज की है, जिसे ‘डीएमई’ यानी डाई मिथाइल ईथर नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस स्वदेशी गैस के आने से एलपीजी के आयात पर भारत की निर्भरता पूरी तरह खत्म हो सकती है।
क्यों पड़ी इस नए विकल्प की जरूरत?
पूरी दुनिया में भारत ऊर्जा की खपत के मामले में तीसरे नंबर पर आता है, जबकि गैस के इस्तेमाल में इसका चौथा स्थान है। परेशानी की बात यह है कि भारत अपनी जरूरत की अधिकांश गैस दूसरे देशों से खरीदता है। अगर एलपीजी की बात करें, तो भारत लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी बाहर से मंगवाता है। इसमें से भी करीब 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यह गैस ‘हॉर्मुज स्ट्रेट’ के समुद्री रास्ते से होकर भारत पहुँचती है। पश्चिम एशिया में जब भी कोई तनाव या संकट पैदा होता है, तो इस रास्ते से होने वाली सप्लाई पर सीधा असर पड़ता है। इसी बड़े संकट का हल निकालने के लिए वैज्ञानिकों ने दिन-रात एक करके यह नया रास्ता निकाला है।

सीएसआईआर और एनसीएल की साझा कामयाबी
इस क्रांतिकारी गैस को सीएसआईआर (CSIR) और पुणे की नेशनल केमिकल लैब (NCL) ने मिलकर तैयार किया है। वैज्ञानिकों ने डाई मिथाइल ईथर (डीएमई) को एलपीजी के पूरक के रूप में पेश किया है। देश में हर दिन लगभग 90 हजार टन एलपीजी की खपत होती है, जिसका मतलब है कि रोजाना करीब 55 से 60 लाख सिलेंडरों का इस्तेमाल किया जाता है। भारतीय मानक ब्यूरो ने एलपीजी में 20 प्रतिशत तक डीएमई मिलाने की मंजूरी दे दी है। अगर एलपीजी की जगह सिर्फ 8 प्रतिशत भी डीएमई का इस्तेमाल शुरू कर दिया जाए, तो भारत हर साल लगभग 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचा सकता है। इससे देश के डॉलर की बड़ी बचत होगी।

कचरे और कोयले से तैयार होती है यह जादुई गैस
इस गैस की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बनाने के लिए हमें किसी बाहरी देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। डाई मिथाइल ईथर को घरेलू स्तर पर मिलने वाले कोयले, बायोमास यानी कृषि के बचे हुए कचरे और मेथनॉल का इस्तेमाल करके बनाया जाता है। यह पूरी तरह से एक पर्यावरण अनुकूल ईंधन है। एलपीजी की तुलना में इसे जलाने पर प्रदूषण बहुत ही कम होता है। इसमें से धुआं या कालिख बिल्कुल नहीं निकलती, जिसके कारण यह बेहद साफ-सुथरा ईंधन माना जा रहा है। फिलहाल पुणे की लैब में बने एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत रोजाना 250 किलोग्राम डीएमई का उत्पादन किया जा रहा है।

सिर्फ रसोई घर ही नहीं, गाड़ियाँ भी दौड़ेंगी इससे
इस प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि डीएमई का फायदा सिर्फ रसोई घर तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। आने वाले समय में इससे ऑटो रिक्शा और बिजली पैदा करने वाले जनरेटर भी चलाए जा सकेंगे। कई मामलों में तो यह डीजल जनरेटर की जगह भी ले सकता है।
एनसीएल के मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर टी राजा ने बताया कि एलपीजी और डीएमई के गुण लगभग एक जैसे ही हैं, बस इनके कैलोरी मान में थोड़ा अंतर होता है। डीएमई को एलपीजी, प्रोपेन और ब्यूटेन के मिश्रण के साथ बहुत ही आसानी से मिलाया जा सकता है। इसके इस्तेमाल के लिए आम उपभोक्ताओं को अपने घरों में रखे सिलेंडर, रेगुलेटर या चूल्हे को बदलने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। वैज्ञानिक इसे भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा गेम-चेंजर मान रहे हैं।


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