17 मई 2026
भोपाल:
सड़कों पर गाड़ियों की तेज रफ्तार के बीच सहमा हुआ खड़ा गोवंश और कचरे के ढेर में अपनी भूख मिटाती गाएं। दूसरी तरफ संसाधनों की भारी कमी के कारण दम तोड़ती गौशालाएं। ये वो कड़वी तस्वीरें हैं जो हमारे गौ-प्रेम और बड़े-बड़े दावों पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती हैं। देश में गाय को ‘राष्ट्रमाता’ बनाने की मांग तो बहुत तेज है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारी आस्था और सरकारी फाइलों के बीच फंसी गाय आज भी चारे, पानी और एक सुरक्षित छत के लिए तरस रही है।
पशुगणना के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में गोवंशीय पशुओं की कुल संख्या 1.57 करोड़ से भी अधिक है। राज्य में करीब 1900 से ज्यादा सक्रिय और निर्माणाधीन गौशालाएं हैं, जिनमें लगभग 3.25 लाख से अधिक गायों को रखा गया है। सरकार की तरफ से एक साल से अधिक उम्र के गोवंश के लिए महज 40 रुपये प्रतिदिन की मदद मिलती है। आज के दौर में जब चारे और दाने की कीमतें आसमान छू रही हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ऊपर से इस बजट का भुगतान भी समय पर नहीं हो पाता, जिसका नतीजा यह होता है कि हजारों बेसहारा गाएं सड़कों पर जहरीला प्लास्टिक खाने को मजबूर हैं।
व्यवस्था के सामने खड़ी हैं ये 5 बड़ी दीवारें
गौशालाओं के सही ढंग से न चल पाने और गोवंश की दुर्दशा के पीछे पांच मुख्य कारण सामने आते हैं:
शहरी इलाकों में गौशालाएं बहुत तंग और छोटी हो चुकी हैं। वहां क्षमता से कहीं अधिक गोवंश को रखा जा रहा है, जिससे गायों को ठीक से खड़े होने की जगह भी नहीं मिलती।
ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में पानी की भारी किल्लत है, जो गौशालाओं के संचालन में एक बहुत बड़ी बाधा बन रही है।
चिकित्सीय सुविधाओं और डॉक्टरों की कमी के चलते गायों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। हालत यह है कि मामूली बीमारियां भी गोवंश के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं।
पर्याप्त मात्रा में सूखा और हरा चारा उपलब्ध न होने के कारण गौशालाओं में रहने वाला गोवंश कुपोषण का शिकार हो रहा है।
गायों की सही ढंग से सेवा और देखभाल करने के लिए समर्पित और कुशल कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है।
निराशा के बीच उम्मीद जगाती कुछ आदर्श गौशालाएं
जहां एक तरफ व्यवस्था से जुड़ी परेशानियां हैं, वहीं कुछ जिलों ने आत्मनिर्भरता और बेहतर प्रबंधन की बेहतरीन मिसाल भी पेश की है:
सागर:यहां की दयोदय गौशाला में गायों को गर्मी से बचाने के लिए कूलर लगाए गए हैं और उनके घूमने के लिए 10 एकड़ का एक सुरक्षित परिसर तैयार किया गया है।
राजगढ़: इस जिले की पंचायतों ने गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में शानदार काम किया है।
बैतूल: यहां गाय के गोबर से खाद और ‘गोकाष्ठ’ (गोबर की लकड़ियां) बनाकर एक मजबूत आर्थिक मॉडल खड़ा किया गया है, जिससे गौशाला का खर्च निकालने में मदद मिलती है।
समाज को बनना होगा सारथी: क्या कहते हैं संत और जानकार?
गौ संरक्षण का काम केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए पूरे समाज को एक साझा संकल्प लेना होगा। जब तक आम नागरिक गौशालाओं से सीधे नहीं जुड़ेंगे, तब तक व्यवस्थाएं पूरी तरह नहीं सुधर सकतीं। हमें सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाय खुद आगे आकर चारे और दवाओं के लिए हाथ बढ़ाना होगा। हर व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार गौशालाओं के प्रबंधन में हिस्सेदार बनना चाहिए।
मध्य प्रदेश गौ संवर्धन बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष, महामंडलेश्वर अखिलेश्वरानंद गिरी का कहना है कि गौ संरक्षण के लिए शासन और आम जनता को मिलकर एक आंदोलन की तरह माहौल तैयार करना होगा। वर्तमान में पूज्य संतों द्वारा गाय को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करने की मांग बिल्कुल जायज है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर पूरा संरक्षण मिलना ही चाहिए। कानून होने के बावजूद अगर गोवंश की दुर्दशा हो रही है, तो इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। गायों के कत्लखाने पूरी तरह बंद होने चाहिए और इसके लिए समाज को जागरूक होना पड़ेगा। स्वयंसेवी संस्थाओं को भी आगे आकर गौशालाओं के बेहतर प्रबंधन की जिम्मेदारी उठानी होगी। गौ संरक्षण की यह मांग सिर्फ एक कानून की मांग नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति और पहचान को बचाने की पुकार है।


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