8 June 2026
नई दिल्ली।
देश में परीक्षाओं की पारदर्शिता और पेपर लीक के मामलों को लेकर घमासान मचा हुआ है। अब इस पूरे विवाद में संसद की एक समिति ने कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय समिति इस समय नीट पेपर लीक मामले और सीबीएसई के ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम सिस्टम से जुड़े विवादों की गहराई से जांच कर रही है।
इसी जांच के सिलसिले में पिछले हफ्ते राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए के अधिकारी समिति के सामने पेश हुए थे। इस दौरान संसदीय समिति ने एनटीए के सामने सवालों की एक लंबी लिस्ट रख दी। समिति ने एनटीए से बेहद सीधा और कड़ा सवाल पूछा है कि आखिर आपकी परिभाषा में पेपर लीक किसे माना जाता है?
एनटीए का दावा और समिति के तीखे सवाल
समिति के सामने पेश हुए एनटीए के अधिकारियों ने अपना बचाव करते हुए कहा कि उनकी प्रणाली या सिस्टम से कोई पेपर लीक नहीं हुआ था। अधिकारियों का दावा है कि केवल एक गेस पेपर के कुछ सवाल पहले से सोशल मीडिया या अन्य जगहों पर प्रसारित हो गए थे, जिसे मीडिया और लोगों द्वारा पेपर लीक के रूप में पेश किया गया।
एनटीए के इस दावे के बाद संसदीय समिति ने उनसे पूछा है कि साल 2018 से लेकर अब तक उनके द्वारा आयोजित की गई परीक्षाओं में वास्तव में क्या-क्या हुआ है और कितने प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं? इसके साथ ही समिति ने यह भी जानना चाहा है कि नीट-यूजी 2024 के प्रश्नपत्र में गड़बड़ियों के आरोपों को लेकर सीबीआई जांच के अलावा एनटीए ने अपने स्तर पर कोई और जांच कराई थी या नहीं?
ओएसएम प्रणाली और नियमों में ढील पर सीबीएसई से जवाब तलब
संसदीय समिति सिर्फ एनटीए तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उसने सीबीएसई को भी आड़े हाथों लिया है। समिति ने सीबीएसई और एनटीए दोनों से ओएसएम यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली से जुड़े मुद्दों पर लिखित उत्तर मांगे हैं।
समिति ने पूछा है कि ओएसएम अनुबंध के लिए जो तीसरा रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी आरएफपी जारी किया गया था, उसमें से उन प्रावधानों को क्यों हटा दिया गया जो खराब रिकॉर्ड वाले बोलीदाताओं (बिडर्स) को अयोग्य ठहराते थे? पहले के नियमों के अनुसार खराब प्रदर्शन करने वालों को काली सूची (ब्लैकलिस्ट) में डाल दिया जाता था, लेकिन नए नियमों में इस कड़े प्रावधान को सिर्फ वर्तमान में ब्लैकलिस्टेड लोगों तक ही सीमित रखकर कमजोर क्यों किया गया? इसके अलावा समिति ने यह भी सवाल उठाया कि बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए न्यूनतम टर्नओवर की सीमा अचानक 50 करोड़ रुपये क्यों तय की गई?
जवाब देने के लिए मिला समय
सूत्रों के मुताबिक संसदीय समिति ने इन तमाम गंभीर सवालों के जवाब देने के लिए समयसीमा तय कर दी है। सीबीएसई को अपने जवाब देने के लिए आज तक का समय दिया गया था, जबकि एनटीए को 10 जून तक समिति के सामने लिखित में अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है। फिलहाल दोनों ही एजेंसियों की तरफ से अभी तक कोई ठोस जवाब सामने नहीं आया है।
समिति ने इसके साथ ही ओएसएम सिस्टम के लिए जारी अलग-अलग आरएफपी में कथित बदलावों के बारे में भी जानकारी मांगी है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि किसी भी कंपनी को इतना बड़ा ठेका या अनुबंध देने से पहले क्या उसकी पृष्ठभूमि की कोई जांच-पड़ताल की गई थी?
कर्मचारियों और राधकृष्णन समिति पर भी रिपोर्ट तलब
संसदीय समिति ने एनटीए से पिछले तीन वर्षों के दौरान काम करने वाले उसके कर्मचारियों की संख्या और साल 2022 से अब तक की गई नई भर्तियों के बारे में भी पूरी जानकारी मांगी है। साथ ही एनटीए द्वारा पिछले तीन वर्षों में उच्च शिक्षा विभाग को सौंपी गई वार्षिक रिपोर्ट की कॉपी भी मांगी गई है।
आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने जून 2024 में इसरो के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति का काम परीक्षाओं को पारदर्शी, सुरक्षित और सुचारू रूप से चलाने के लिए सुझाव देना था। सूत्रों के अनुसार, संसदीय समिति ने अब राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट में दी गई 101 सिफारिशों में से प्रत्येक पर विस्तृत विवरण और एनटीए द्वारा उन पर की गई कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट मांगी है।


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