9 सितंबर 2026:

भादों मास की अमावस्या आने वाली है। यह अमावस्या दो तिथि को पड़ रही है 10 और 11 सितंबर ।

10 सितंबर को  10:00 बजे अमावस्या तिथि आरंभ हो रही है जो 11 तारीख को सुबह समाप्त हो रही है।
इस अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहते हैं। कुशोत्पाटिनी यानि कुशा का उत्पादक करना यानी कुशा को उखाड़ना। वैसे तो अमावस्या तिथि को फूल पत्ते नहीं तोड़ना चाहिए लेकिन कुशा और यह अमावस्या वर्ष में एक बार आती है और इसके नाम के अनुसार इस दिन कुशा को उखाड़ा जाता है ।इस अमावस्या तिथि की विशेष महिमा होती है।

अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 से प्रारंभ हो रही है और 11 सितंबर को सुबह 8:56 पर समाप्त हो रही है।

आईए जानते हैं इसे  कुशोत्पाटिनी अमावस्या क्यों कहते हैं:
इस दिन कुशा को उखाड़ लाते हैं। और कुशा को घर पर लाकर रखते हैं यह बड़ा ही शुभ माना जाता है।
आईए जानते हैं कुशा को इतना पवित्र क्यों माना गया है ।
जब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण किया था भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए हिरण्याक्ष असुर से पृथ्वी को बचाने के लिए वराह रूप धारण किया था और महान असुर हिरण्याक्ष का वध किया था।  और पृथ्वी को  मुक्त करा कर जैसे ही उन्होंने अपने बालों को फटकारा, तो उनके रोम से कुशा प्रकट हुई । यह वही कुशा है जब पितृपक्ष में हम लोग पूजा पाठ में कुशा की अंगूठी पहनते हैं । पितृपक्ष में जब हम लोग अर्ध्य देते हैं तो यहां पर कुश को रखते हैं।  जिससे जल पवित्र हो जाता है। कोई भी मांगलिक कार्य हो ,हर कर्मकांड में शादी विवाह हो ,कुशा का उपयोग किया जाता है । किसी भी घास को जल में डालकर जब हम छिड़कते हैं तो वह वस्तु भी पवित्र हो जाती है।  यह पवित्रता कुशा से ही आती है इसलिए कुशा को धारण करके हम तर्पण करते हैं।

कुशा के बारे में एक अन्य प्रसंग:
कुशा के बारे में एक प्रसंग और आता है जब कुशा पृथ्वी से उत्पन्न होती है।  तो उसकी धार बड़ी ही तेज होती है।  आप तो जानते ही हैं कुशा नीचे थोड़ा मोटी होती है और ऊपर से पतली हो जाती है ‌।  उसे पर यदि आप हाथ फिराते हैं तो हाथ कट जाता है।  इसलिए इसे शार्प कहा गया है । यानी कुशाग्र बुद्धि ।
यहां पर कुशा का नाम आ रहा है। कुशा के ऊपरी हिस्से को कुशाग्र कहा गया है । प्राचीन काल में गुरुकुलों में जब कोई विद्यार्थी गुरु जी के पास शरण में जाता था, तब  गुरुजी उनसे कहते थे कुशा उखाड़ कर ले आओ तो विद्यार्थी कुशा उखाड़ कर लाता था।  गुरुजी उनके हाथ देखते जिनके हाथ नहीं कटे रहते ,तो समझ जाते कि यह विद्यार्थी बड़ा ही तेज है।  जिनके हाथ कट गए होते हैं, तभी गुरुजी समझ जाते हैं यह विद्यार्थी तनिक थोड़ा ध्यान देने लायक है । यही से यह प्रथा शुरू हुई कुशाग्र बुद्धि की -यह तेज बुद्धि है ,तीव्र बुद्धि है।

इस दिन  कुशा लेकर आते हैं और पितृपक्ष में इससे पूजन करते हैं। इस दिन कुशा लाकर वर्ष भर कुशा को घर में रखने से घर में खुशहाली आती है।

इस अमावस्या पर क्या करें:

अमावस्या के दिन सूक्ष्म हवन  अवश्य करना चाहिए ।
हवन के लिए तिल ,जौ, चावल ,चंदन पाउडर, गूगल, गुड़ और देसी कपूर को मिलाकर हवन करना चाहिए।
कुलदेवताभ्यो नमः ,ग्राम देवताभ्यो नमः, स्थान देवताभ्यो नमः,वास्तु देवताभ्यो नमः,श्री लक्ष्मी नारायणभ्यो नमः ,श्री उमा महेश्वरभ्याय नमः ,सर्व पितृ देवताभ्यो नमः।
इन सात  मंत्रों से अमावस्या के दिन हवन करना चाहिए।

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