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3 June 2026 : खबर प्रधान डेस्क:

नई दिल्ली।
देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने बेटियों के हक़ में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि किसी भी बेटी को सिर्फ़ उसके शादीशुदा होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति (पिता या माता की जगह नौकरी) या किसी आर्थिक लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने ज़ोर देकर कहा कि शादीशुदा बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखना पूरी तरह से मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के समानता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अनुकंपा नियुक्ति के मामले में विवाहित बेटी को परिवार की श्रेणी में शामिल नहीं माना गया था। यह मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा था, जिसके मृत पिता के पास एक उचित मूल्य की दुकान (राशन दुकान) का लाइसेंस था। पिता की मृत्यु के बाद बेटी ने अनुकंपा के आधार पर उस दुकान के आवंटन का दावा किया था। लेकिन अधिकारियों ने उसकी अर्ज़ी को सिर्फ़ इस आधार पर ख़ारिज कर दिया था कि वह शादीशुदा है।

रूढ़िवादी सोच पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा प्रहार:
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए समाज की पुरानी सोच पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जब शादीशुदा बेटे को परिवार का सदस्य माना जाता है, तो विवाहित बेटी को बाहर कर देना सरासर भेदभाव है। यह भेदभाव उस पुरानी और रूढ़िवादी सोच पर आधारित है कि शादी के बाद बेटी दूसरे परिवार की सदस्य बन जाती है और मायके से उसका संबंध ख़त्म हो जाता है। ऐसी धारणा हमारे संविधान की समानता और लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) की भावना के बिल्कुल विपरीत है।
अदालत ने समझाया कि अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली मदद या नौकरी का असली मक़सद मृतक के परिवार को तुरंत आर्थिक सहारा देना होता है। यह कोई विरासत या उत्तराधिकार का अधिकार नहीं है। इसलिए, आवेदन करने वाले व्यक्ति की आर्थिक ज़रूरत, उसकी निर्भरता और उसकी क्षमताओं को देखा जाना चाहिए, न कि उसकी वैवाहिक स्थिति को।

शादी के बाद भी माता-पिता की ज़िम्मेदारी उठाती हैं बेटियां:
कोर्ट ने इस बात को भी स्वीकारा कि आज के सामाजिक माहौल में ऐसी कई परिस्थितियां हैं जहाँ शादीशुदा बेटियां भी अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, उनका भरण-पोषण करती हैं या उन पर निर्भर रहती हैं। वहीं दूसरी ओर, कई बार बेटे परिवार का हिस्सा होने के बावजूद वास्तव में अपने माता-पिता पर आश्रित नहीं होते या उनकी परवाह नहीं करते। इसलिए किसी की आश्रितता का फ़ैसला ज़मीनी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल वैवाहिक स्थिति देखकर।
मौजूदा मामले के तथ्यों का ज़िक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित महिला शादी के बाद भी उसी गांव में रह रही थी। वह अपने पिता की दुकान के संचालन में भी सक्रिय रूप से सहयोग देती थी। पिता और फिर मां की मृत्यु के बाद उसने अपनी बहनों की ज़िम्मेदारी भी संभाली, जिनमें से एक बहन दृष्टिबाधित (ब्लाइंड) है। इन सभी ठोस तथ्यों को सरकार या किसी अदालत द्वारा नकारा नहीं जा सकता। कोर्ट के इस फ़ैसले से अब देश भर में विवाहित बेटियों को सरकारी नियमों में मिलने वाले लाभों के लिए एक नया और मज़बूत अधिकार मिल गया है।


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