30 मई 2026
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि अगर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अपनी सेवा में बने रहना है, यानी अपनी नौकरी बचानी है, तो उन्हें शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करनी ही होगी।
हालांकि, कोर्ट ने शिक्षकों को आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों और परेशानियों को ध्यान में रखते हुए एक बड़ी राहत भी दी है। सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी पास करने की समय सीमा को तीन साल के लिए आगे बढ़ा दिया है। अब शिक्षकों के पास इस परीक्षा को पास करने के लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय होगा। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि यह आखिरी मौका है और इसके बाद किसी भी हाल में समय सीमा को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। सरकार को यह हिदायत भी दी गई है कि टीईटी परीक्षा साल में दो बार जरूर आयोजित की जाए ताकि शिक्षकों को पर्याप्त मौके मिल सकें।
कोर्ट ने खारिज कीं 65 पुनर्विचार याचिकाएं
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने राज्यों, शिक्षक संगठनों और खुद शिक्षकों की तरफ से दायर की गई 65 पुनर्विचार याचिकाओं को पूरी तरह से खारिज करते हुए यह आदेश दिया। दरअसल, याचिकाओं में साल 2025 के उस पुराने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 के लागू होने से पहले नियुक्त हुए और रिटायरमेंट से पहले पांच साल से अधिक का सेवा समय रखने वाले शिक्षकों को 1 सितंबर 2025 तक टीईटी पास करना जरूरी होगा। शिक्षकों की दलील थी कि पुराने शिक्षकों पर टीईटी का नियम लागू करना पुराने कानून को पीछे से लागू करने जैसा है, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह से नकार दिया।
बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बहुत ही कड़े शब्दों में कहा कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण यानी अच्छी शिक्षा देना उनका मौलिक अधिकार है और इससे किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत का मानना है कि टीईटी सिर्फ एक औपचारिक परीक्षा नहीं है, बल्कि यह प्राथमिक शिक्षा के स्तर और उसकी गुणवत्ता को बनाए रखने का एक बेहद जरूरी जरिया है। संविधान और आरटीई अधिनियम के तहत बच्चों को अच्छी शिक्षा देना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, इसलिए शिक्षकों के लिए यह न्यूनतम योग्यता तय करना बेहद आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि केवल इस आधार पर फैसले को नहीं बदला जा सकता कि बड़ी संख्या में शिक्षक अपनी नौकरी खो सकते हैं।
हाई कोर्ट्स के लिए भी जारी हुआ बड़ा निर्देश
इसी मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश की विभिन्न हाई कोर्ट्स में फैसलों में होने वाली देरी पर भी गहरी चिंता जताई। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 में मिली अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए देश की सभी हाई कोर्ट्स के लिए गाइडलाइंस जारी की हैं।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि विभिन्न हाई कोर्ट्स में सुनवाई पूरी होने के बाद भी फैसला सुनाने में बहुत ज्यादा देरी की जाती है। इस देरी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अब से किसी भी मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद अधिकतम तीन महीने के भीतर फैसला सुना दिया जाना चाहिए। खासकर निजी स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में और भी तेजी से फैसला आना चाहिए।
अदालत ने कहा कि मुकदमों में शामिल लोगों को फैसले की देरी की वजह से जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती। इसलिए अगर सुनवाई पूरी होने के बाद चार महीने के भीतर भी फैसला नहीं सुनाया जाता है, तो मामले से जुड़े पक्षकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क कर सकते हैं, ताकि उस केस को किसी दूसरी पीठ (बेंच) को सौंपा जा सके।


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