13 June 2026
नई दिल्ली:
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन को देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए उनका नामांकन पत्र रद्द किए जाने के मामले में कोर्ट ने सुनवाई की, लेकिन उन्हें यहाँ से भी कोई राहत नहीं मिल सकी।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अतुल एस वेंकटकर की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जब मीनाक्षी नटराजन के वकील और जाने-माने कानूनविद अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलें पेश कीं, तो अदालत ने उन तर्कों को दरकिनार कर दिया। पीठ ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालतें हस्तक्षेप नहीं करती हैं। कोर्ट ने साफ किया कि निर्वाचन अधिकारी यानी आरओ का फैसला चाहे कितना भी गलत या कमियों से भरा क्यों न हो, एक बार जब नामांकन रद्द हो जाता है, तो उसके बाद चुनाव प्रक्रिया के बीच में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं रह जाता।
सिंघवी ने अदालत में दलील दी थी कि नामांकन को बिना किसी ठोस आधार के सिर्फ एक शिकायत पर मिले नोटिस के आधार पर रद्द कर दिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की जगह उसे इस तरह से दबाया जा रहा है। सिंघवी ने सवाल उठाया कि जहां संसदीय या विधानसभा चुनाव में निर्वाचन अधिकारी द्वारा नामांकन खारिज किए जाने के बाद अदालत में जाने का रास्ता खुला रहता है, क्या इस प्रक्रिया में कोर्ट कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता?
इस पर न्यायमूर्ति मिश्रा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालतें बार-बार यह साफ कर चुकी हैं कि एक बार नामांकन रद्द हो जाने पर सिर्फ चुनाव याचिका ही एकमात्र कानूनी रास्ता बचती है। अदालत ने कहा कि चाहे फैसला सही हो या गलत, चुनाव के बीच में इस तरह की याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नामांकन स्वीकार कर लिया गया होता और दूसरा प्रत्याशी निर्विरोध जीत जाता, तो बात अलग थी, लेकिन इस स्थिति में कानूनी नियम बेहद साफ हैं।
इस फैसले के बाद कानूनी जानकारों का कहना है कि अब मीनाक्षी नटराजन के पास केवल एक ही विकल्प बचा है, और वह है चुनाव याचिका दायर करना। दरअसल, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम एक सौ पचासी एक के तहत किसी भी चुनाव के परिणाम को चुनौती देने का मुख्य जरिया चुनाव याचिका ही होती है। नियम के अनुसार, चुनाव का परिणाम घोषित होने के पैंतालीस दिनों के भीतर संबंधित हाई कोर्ट में यह याचिका दायर की जा सकती है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम एक सौ के प्रावधानों के तहत यदि यह साबित हो जाता है कि किसी उम्मीदवार का नामांकन गलत तरीके से खारिज किया गया था, तो न्यायालय उस पूरे चुनाव को ही रद्द घोषित कर सकता है।
इस बीच, दिल्ली की सड़कों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस फैसले और नामांकन रद्द किए जाने के विरोध में भारी प्रदर्शन किया। कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में हुए इस प्रदर्शन में कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग हमारी बात नहीं सुन रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अनुमति भी नहीं दी जा रही है, जिसके कारण उनके पास सड़कों पर उतरने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था।


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