उत्तर से दक्षिण तक होलिका की राख का महत्व, हर प्रदेश में जुड़ी खास परंपराएँ
संवाददाता
2 March 2026
अपडेटेड: 12:03 AM 0rdGMT+0530
2 मार्च 2026
होली के अगले दिन यानी धुलेंडी की सुबह कई लोग होलिका दहन की राख या अंगारे घर लेकर आते हैं। यह परंपरा भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही है और हर जगह इससे जुड़ी अपनी खास मान्यताएँ और रीति-रिवाज हैं।
उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस राख को बेहद पवित्र माना जाता है। लोग इसे घर के मुख्य द्वार या पूजा स्थान पर रखते हैं और तिलक लगाते हैं। मान्यता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है और परिवार पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है। कई जगह इसे बच्चों और बुजुर्गों के माथे पर लगाकर सुरक्षा और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में लोग होलिका की राख को खेतों में डालते हैं। किसान इसे नई फसल के लिए शुभ मानते हैं और विश्वास करते हैं कि इससे भूमि की उर्वरता और समृद्धि बढ़ती है। यह परंपरा प्रकृति और कृषि से जुड़ी आस्था को दर्शाती है।
बिहार और झारखंड में इसे घर की चौखट पर छिड़कने की परंपरा है। वहां यह विश्वास है कि इससे बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है। कई जगह महिलाएँ इसे घर के कोनों में डालती हैं ताकि पूरे वर्ष सुख-शांति बनी रहे।
दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में, विशेषकर कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में, होलिका की राख को शरीर पर हल्का सा लगाकर शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसे जीवन में नए आरंभ और मानसिक शुद्धि का संदेश माना जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी राख को प्राकृतिक कीटाणुनाशक माना जाता था। पुराने समय में लोग इसे घर और खेतों में छिड़कते थे ताकि कीड़े-मकोड़े और संक्रमण कम हो सकें।
इस प्रकार होलिका की राख केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, स्वास्थ्य, कृषि, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जो भारत की विविध संस्कृति और एकता को भी दर्शाती है l