15 अप्रैल 2026

चंबल:

मध्य प्रदेश के चंबल अंचल में रेत माफियाओं का आतंक एक बार फिर चर्चा में है।
मध्य प्रदेश का चंबल इलाका, खासकर मुरैना, भिंड और दतिया, एक बार फिर रेत माफियाओं के खूनी खेल का गवाह बना है। हाल ही में मुरैना जिले के दिमनी थाना क्षेत्र में ड्यूटी पर तैनात वन रक्षक हरकेश गुर्जर की ट्रैक्टर-ट्रॉली से कुचलकर हत्या कर दी गई। यह घटना दर्शाती है कि इस क्षेत्र में माफियाओं के मन में कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।

यह सनसनीखेज वारदात सुबह करीब 6 बजे हुई जब वन विभाग की टीम नियमित गश्त पर थी। टीम ने अवैध रेत से भरी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को रोकने का प्रयास किया, लेकिन ड्राइवर ने वाहन रोकने के बजाय उसकी रफ्तार बढ़ा दी और वन रक्षक को कुचलते हुए भाग निकला।
माफियाओं का दुस्साहस: दफ्तर में घुसकर दी धमकी
हैरानी की बात यह है कि माफियाओं का साहस केवल हत्या तक सीमित नहीं है। सबलगढ़ रेंज में कुछ आरोपियों ने वन विभाग के दफ्तर (बैरक) में घुसकर कर्मचारियों को जान से मारने की धमकी दी और उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। इस मामले में पुलिस ने शासकीय कार्य में बाधा डालने का केस दर्ज किया है।
हिंसा का खौफनाक इतिहास
चंबल में रेत माफियाओं द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों पर हमले का इतिहास काफी पुराना और डरावना है। पिछले साढ़े तीन दशकों में यहाँ 35 से अधिक हत्याएं हो चुकी हैं:
08 मार्च 2012: आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की ट्रैक्टर से कुचलकर निर्मम हत्या।
2015-2024: इस दौरान हवलदार विश्वनाथ, आरक्षक धर्मेंद्र चौहान और डिप्टी रेंजर सहित कई जांबाज अधिकारियों को माफियाओं ने अपना निशाना बनाया।
हमले के तरीके: अवैध उत्खनन रोकने पर पुलिस और वन विभाग की टीम पर फायरिंग, पथराव और वाहनों से कुचलने की घटनाएं यहाँ आम हो गई हैं।
पर्यावरण और वन्यजीवों पर संकट
अवैध उत्खनन न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती है, बल्कि यह राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल सेंचुरी के लिए भी बड़ा खतरा बन गया है।
रेत के अंधाधुंध दोहन से नदियों का अस्तित्व खतरे में है।
रेत में अंडे देने वाले दुर्लभ घड़ियालों और अन्य जलीय जीवों के प्रजनन पर इसका सीधा बुरा असर पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद यहाँ अवैध खनन जारी है, जो गहरी चिंता का विषय है।
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कांग्रेस नेता डॉ. गोविंद सिंह ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि रेत माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। उन्होंने अवैध उत्खनन में स्थानीय नेताओं और पुलिस की मिलीभगत होने का दावा भी किया है।
वास्तव में रेत माफियाओं का आतंक अब एक गंभीर सामाजिक और पर्यावरणीय संकट बन चुका है। प्रशासन के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात बेकाबू नजर आ रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए अब सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका को मिलकर एक सख्त और ठोस कार्ययोजना बनानी होगी।