18 अप्रैल 2026

नई दिल्ली:
महिला आरक्षण को लेकर देश में लंबे समय से चल रही बहस के बीच एक बड़ी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लाया गया संविधान संशोधन विधेयक फिलहाल पारित नहीं हो सका है। सदन में हुई वोटिंग के दौरान सरकार को जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया, जिसकी वजह से यह ऐतिहासिक कदम कानून की शक्ल नहीं ले सका।

सदन में हुई 21 घंटे की मैराथन बहस
इस ऐतिहासिक बिल पर सदन में काफी लंबी चर्चा हुई। कुल 21 घंटों तक चली इस बहस में पक्ष और विपक्ष के कई बड़े नेताओं ने अपनी बात रखी।
बहस से जुड़ी कुछ मुख्य बातें:
कुल 130 सांसदों ने इस चर्चा में हिस्सा लिया और अपने विचार साझा किए।
महिला सशक्तिकरण से जुड़े इस मुद्दे पर 56 महिला सांसदों ने भी अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई।
पूरी बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक और बहस देखने को मिली।

वोटों का गणित और हार की वजह
लोकसभा में इस बिल पर हुई वोटिंग के आंकड़े बताते हैं कि सदन में कुल 528 वोट डाले गए थे। किसी भी संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए सदन में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई मतों की जरूरत होती है। इस हिसाब से बिल को पास करने के लिए कम से कम 352 वोटों की आवश्यकता थी।
वोटिंग का नतीजा इस प्रकार रहा:
बिल के समर्थन में 298 वोट पड़े।
बिल के विरोध में 230 वोट पड़े।
चूंकि समर्थन में पड़े वोटों की संख्या जरूरी आंकड़े (352) से 54 कम रह गई, इसलिए यह विधेयक गिर गया।
विपक्ष पर बरसी सरकार और प्रदर्शन
बिल के गिर जाने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि विपक्ष ने एक सुनहरा मौका गंवा दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष महिलाओं को उनके हक और अधिकार देने के पक्ष में नहीं है।
इस फैसले के विरोध में भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने संसद परिसर में जमकर प्रदर्शन किया और नारेबाजी की। महिला सांसदों ने तख्तियां लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की और कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण की राह में रोड़ा अटकाया जा रहा है।

क्या है विवाद की असली जड़
विधेयक के गिर जाने के बाद अब दो मुद्दे सबसे ज्यादा चर्चा में हैं- महिला आरक्षण और परिसीमन। विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध परिसीमन (सीटों के दोबारा निर्धारण) को लेकर है। उनका कहना है कि आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना गलत है, क्योंकि इससे कई राज्यों की राजनीतिक स्थिति बदल सकती है।
विपक्ष का क्या है तर्क
वहीं दूसरी ओर, विपक्ष ने इस बिल के स्वरूप पर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि वे आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से इस बिल में परिसीमन (Delimitation) की शर्त जोड़ी गई है, वह सही नहीं है। विपक्ष का तर्क है कि परिसीमन के कारण दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों की संख्या पर असर पड़ सकता है और सीटों की संरचना बदल सकती है, जो राज्यों के साथ अन्याय होगा।

लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर छिड़ी रार, विपक्ष ने बिल गिरने को बताया अपनी जीत
संसद में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन विधेयक) के गिर जाने के बाद देश का राजनीतिक पारा चढ़ गया है। जहाँ एक तरफ सरकार इसे विपक्ष की अड़ंगेबाजी बता रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने इसे अपनी बड़ी जीत करार दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने आने वाले चुनावों से पहले एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सदन के नतीजे पर खुशी जताते हुए कहा कि हमने संविधान पर होने वाले एक बड़े हमले को समय रहते रोक दिया है। राहुल गांधी के मुताबिक, यह विधेयक वास्तव में महिलाओं को आरक्षण देने के लिए नहीं लाया गया था, बल्कि यह देश की मौजूदा राजनीतिक संरचना और ढांचे को बदलने की एक कोशिश थी। विपक्ष का मानना है कि बिल के पीछे का असली मकसद कुछ और ही था जिसे उन्होंने नाकाम कर दिया है।

फिलहाल, 21 घंटे की भारी बहस और वोटिंग के बाद यह बिल भले ही पास न हो पाया हो, लेकिन इसने सड़क से लेकर संसद तक एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में अगला कदम क्या उठाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया है कि सरकार महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार का कहना है कि वे इस पर पीछे नहीं हटेंगे और भविष्य में इसे सही तरीके से लागू करने की कोशिश जारी रखेंगे। फिलहाल इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या 2029 के चुनावों से पहले महिलाओं को आरक्षण मिल पाएगा या नहीं।