10 June 2026
गुलाम जम्मू-कश्मीर (पीओके) में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं. वहां अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे स्थानीय नागरिकों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी हैं. इस क्रूर कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में हाहाकार मचा हुआ है.
शांतिपूर्ण आंदोलन पर अंधाधुंध फायरिंग, दर्जनों मौतें
पीओके के मुजफ्फराबाद, रावलकोट, पुंछ और इसके आस-पास के इलाकों में अपनी विभिन्न मांगों को लेकर करीब 2000 लोग बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर रहे थे. इस आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तानी रेंजर और पुलिस बल के साथ-साथ सेना को भी तैनात कर दिया गया. सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए उन पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं. इस खूनी कार्रवाई में दर्जनों आंदोलनकारियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं.
आंकड़ों को छुपाने की कोशिश, इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद
घटना के बाद से ही पाकिस्तानी प्रशासन सच को दबाने की कोशिशों में जुट गया है. जमीनी हकीकत और असली तस्वीरें दुनिया के सामने न आ सकें, इसके लिए पूरे क्षेत्र में मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह से ठप कर दिया गया है. जहां एक तरफ वहां के स्थानीय पुलिस अधिकारी केवल 12 लोगों के मारे जाने का दावा कर रहे हैं, वहीं इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का कहना है कि मरने वालों की संख्या दर्जनों में है और कुछ जगहों पर यह आंकड़ा 30 से भी ऊपर पहुंच चुका है.
भारत का सख्त रुख: अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग
पीओके में आम नागरिकों पर हुए इस जानलेवा हमले को लेकर भारत सरकार ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के इस अमानवीय कृत्य की कड़े शब्दों में निंदा की है. भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है. भारत का कहना है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं को छुपाने के लिए हमेशा की तरह झूठी खबरों का सहारा ले रहा है और वहां के नागरिकों के अधिकारों का हनन कर रहा है.
आखिर क्यों भड़का है जनता का गुस्सा?
इस भारी विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह वहां की विधानसभा में आरक्षित सीटों को लेकर चल रहा बड़ा विवाद है. दरअसल, पीओके विधानसभा की 45 निर्वाचित सीटों में से 12 सीटें शरणार्थियों के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान है. स्थानीय लोगों और संगठनों का आरोप है कि इन आरक्षित सीटों की वजह से वहां के मूल निवासियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित होता है और वे लंबे समय से इन सीटों को खत्म करने की मांग कर रहे हैं. इसके अलावा क्षेत्र में लगातार बढ़ती महंगाई, बिजली की आसमान छूती दरों, आटे-गेहूं की भारी किल्लत और बढ़ती बेरोजगारी ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है, जिसके चलते लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं.


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