7 June 2026
नई दिल्ली
आम उपभोक्ताओं के बजट को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। सरकार ने घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में सीधे 29 रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। राहत की बात ढूंढ रहे लोगों के लिए बुरी खबर यह है कि ये बढ़ी हुई कीमतें तत्काल प्रभाव से लागू भी हो चुकी हैं। इस बढ़ोतरी के बाद अब अलग-अलग शहरों में रसोई गैस की कीमतें आसमान छूने लगी हैं।
तीन महीने में दूसरी बार बढ़े दाम
यह पिछले तीन महीनों के भीतर घरेलू गैस की कीमतों में हुई दूसरी बड़ी मूल्य वृद्धि है। इससे पहले ठीक सात मार्च को सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम में सीधे 60 रुपये की बढ़ोतरी की थी। अब लगातार दूसरी बार जेब पर पड़े इस बोझ से आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट का बिगड़ना तय माना जा रहा है।
अगर बड़े शहरों की बात करें, तो अब दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाला घरेलू एलपीजी सिलेंडर 913 रुपये के बजाय 942 रुपये में मिलेगा। वहीं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इसकी कीमत अब बढ़कर 947.50 रुपये हो गई है, जो कि पहले 918.50 रुपये थी।
क्यों बढ़ रही हैं कीमतें?
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस समय पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में मची उथल-पुथल की वजह से एलपीजी की लागत लगातार बढ़ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और समुद्री आपूर्ति मार्गों पर मंडराते खतरों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों को काफी ऊंचा कर दिया है, जिसका सीधा असर अब हमारे घरेलू बाजार और रसोई पर दिख रहा है।
सिर्फ गैस ही नहीं, पेट्रोल-डीजल और सीएनजी भी हुए महंगे
एलपीजी कीमतों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय पर हुई है जब देश में अन्य ईंधनों के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। मई महीने के मध्य से लेकर अब तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इतना ही नहीं, सीएनजी के दाम भी लगभग 6 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ा दिए गए हैं।
घाटे में चल रही हैं तेल कंपनियां
सूत्रों के मुताबिक, मार्च में कीमतें बढ़ाए जाने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों को घरेलू एलपीजी और अन्य ईंधनों की बिक्री पर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। इस हालिया संशोधन से पहले तक कंपनियों को प्रत्येक घरेलू सिलेंडर पर लगभग 703 रुपये का घाटा हो रहा था। वहीं पेट्रोल पर करीब 11 रुपये और डीजल पर 33.6 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान कंपनियों को झेलना पड़ रहा था। ऐसे में बढ़ती लागत का कुछ बोझ उपभोक्ताओं पर डालना तेल कंपनियों के लिए जरूरी माना जा रहा था, जिसका खामियाजा अब आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।


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