1 मई 2026
मुंबई।
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर राज्य सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण हलफनामा दायर किया है। सरकार का कहना है कि 2014 में मुस्लिमों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण देने के लिए जो अध्यादेश (ऑर्डिनेंस) लाया गया था, वह उसी साल दिसंबर में खत्म हो गया था। इसलिए, आरक्षण स्वतः ही समाप्त हो गया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि हालिया किसी सरकारी आदेश से इस कोटे को खत्म नहीं किया गया है।
मामला क्या है?
दरअसल, वकील सैयद एजाज नकवी द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में महाराष्ट्र सरकार ने यह हलफनामा पेश किया है। नकवी की याचिका ने 17 फरवरी के एक सरकारी आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि इस आदेश के जरिए मुस्लिमों का आरक्षण रद्द कर दिया गया। याचिका में सरकार के इस कथित फैसले को ‘नस्ली भेदभाव’ बताया गया था और दावा किया गया था कि यह संविधान का उल्लंघन है।
सरकार का जवाब:
सामाजिक न्याय और विशेष सहायता विभाग द्वारा दायर हलफनामे में सरकार ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया है। सरकार ने कहा कि इस मामले में कोई भेदभाव नहीं किया गया है और न ही संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन हुआ है। हलफनामे में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
1.अध्यादेश की समाप्ति:मुस्लिमों के लिए 5% आरक्षण का प्रावधान जुलाई 2014 में एक अध्यादेश के माध्यम से किया गया था। यह अध्यादेश उसी वर्ष दिसंबर में समाप्त हो गया।
2.कानूनी शून्यता: अध्यादेश के समाप्त होने के बाद, किसी भी वैध कानून द्वारा इसे प्रतिस्थापित (रिप्लेस) नहीं किया गया। इसका मतलब है कि आरक्षण के लिए कोई कानूनी आधार नहीं रहा।
3.कोटा खत्म नहीं किया गया: चूंकि आरक्षण अध्यादेश की समाप्ति के साथ ही खत्म हो गया था, इसलिए अब इसे किसी सरकारी आदेश द्वारा खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता। फरवरी में जारी सरकारी आदेश से मुस्लिमों के लिए किसी भी कोटे को समाप्त नहीं किया गया है।
सरकार ने अदालत से याचिका को खारिज करने का अनुरोध किया है, इसे “गलत तथ्यों की धारणाओं” पर आधारित बताया है। सरकार का तर्क है कि जब आरक्षण का कोई कानूनी आधार ही नहीं है, तो उस पर किसी अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।
यह हलफनामा महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण के संवेदनशील मुद्दे पर कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है और यह दर्शाता है कि यह कोटा लंबे समय से प्रभावी नहीं है। अब सबकी नजर बॉम्बे हाई कोर्ट पर है कि वह सरकार के इस हलफनामे पर क्या फैसला सुनाती है।


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