मौनीअमावस्या पर संगम तट पर तनाव: अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन आमने-सामने:
संवाददाता
19 January 2026
अपडेटेड: 1:46 PM 0thGMT+0530
मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर प्रयागराज में उस समय असहज स्थिति उत्पन्न हो गई जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और स्थानीय प्रशासन के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए। यह दिन माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है, जब देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु संगम में पवित्र स्नान के लिए पहुंचते हैं। इसी कारण प्रशासन द्वारा व्यापक सुरक्षा व्यवस्था और कड़े भीड़ नियंत्रण उपाय लागू किए गए थे, ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या दुर्घटना से बचा जा सके।
घटना के अनुसार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों और अनुयायियों के साथ संगम क्षेत्र की ओर जा रहे थे। मार्ग में प्रशासन द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स के पास उन्हें रोक दिया गया। पुलिस अधिकारियों ने आगे बढ़ने पर आपत्ति जताते हुए भीड़ अधिक होने का हवाला दिया और सुरक्षा नियमों का पालन करने की बात कही। इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों ने आपत्ति दर्ज की और कहा कि धार्मिक परंपराओं के अनुसार उन्हें संगम तक जाने दिया जाना चाहिए। इसी दौरान दोनों पक्षों के बीच कहासुनी बढ़ गई, जिसने कुछ ही देर में तनाव का रूप ले लिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विवाद के दौरान धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। हालांकि प्रशासन ने हालात को संभालने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया। इस घटना से कुछ समय के लिए संगम क्षेत्र का माहौल तनावपूर्ण हो गया, जबकि आसपास मौजूद श्रद्धालु असमंजस की स्थिति में नजर आए। प्रशासन की प्राथमिकता भीड़ को सुरक्षित रखना और स्नान प्रक्रिया को सुचारु रूप से जारी रखना बताई गई।
विवाद के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने संगम में स्नान न करने का निर्णय लिया और वापस लौट गए। उन्होंने कहा कि उनके शिष्यों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है। उनके समर्थकों का भी कहना था कि प्रशासन को संत-समाज के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखानी चाहिए थी। दूसरी ओर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि किसी विशेष व्यक्ति या समूह को लक्ष्य बनाकर कोई कार्रवाई नहीं की गई, बल्कि यह निर्णय केवल जन-सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए लिया गया था।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि मौनी अमावस्या के दिन संगम क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है, ऐसे में किसी भी तरह की विशेष व्यवस्था या परंपरागत जुलूस से अव्यवस्था फैलने की आशंका रहती है। इसी कारण सभी के लिए समान नियम लागू किए गए थे। अधिकारियों के अनुसार यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाता, तो स्थिति गंभीर हो सकती थी और जनहानि का खतरा भी उत्पन्न हो सकता था।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर धार्मिक आस्था और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन के मुद्दे को सामने ला दिया है। जहां एक ओर संत-समाज अपनी परंपराओं और सम्मान की बात करता है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन की जिम्मेदारी लाखों लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होती है। मौनी अमावस्या जैसे अत्यंत पवित्र और भीड़भाड़ वाले पर्व पर दोनों पक्षों के बीच बेहतर संवाद और समन्वय की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि भविष्य में इस तरह की स्थितियों से बचा जा सके और श्रद्धालु शांतिपूर्ण ढंग से अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन कर सकें।