सबरीमाला विवाद: केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के बीच ठनी, सरकार बोली- ‘धार्मिक मामलों में दखल न दे अदालत’
संवाददाता
8 April 2026
अपडेटेड: 1:30 PM 0thGMT+0530
8 अप्रैल 2026
नई दिल्ली।
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गरमा गया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और अदालत के बीच तीखी बहस देखने को मिली। सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि अदालतों को सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं और आस्था के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि 2018 में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने का फैसला सही नहीं था। सरकार का कहना है कि यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और किसी खास संप्रदाय के अपने अधिकारों से जुड़ा है। सरकार ने तर्क दिया कि:
* हर धार्मिक समूह की अपनी कुछ परंपराएं होती हैं जिनका सम्मान होना चाहिए।
* हर चीज को सिर्फ ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ के तराजू में नहीं तौला जा सकता।
* उदाहरण के तौर पर, यदि किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना अनिवार्य है, तो इसे मौलिक अधिकारों का हनन नहीं माना जा सकता।
अदालत का जवाब: सामाजिक बुराई पर चुप नहीं बैठ सकते
सरकार की दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि:
* अगर किसी ‘सामाजिक बुराई’ को धर्म की आड़ में छिपाया गया है, तो अदालत को उसमें दखल देने का पूरा हक है।
* कोर्ट यह तय कर सकता है कि कोई प्रथा वास्तव में धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या सिर्फ एक सामाजिक कुरीति।
* न्यायमूर्ति नागरत्ना ने भावुक होते हुए कहा कि एक महिला होने के नाते वह यह नहीं स्वीकार कर सकतीं कि मासिक धर्म (Periods) के कारण महिलाओं को ‘अछूत’ माना जाए। उन्होंने अनुच्छेद 17 (छुआछूत के खिलाफ अधिकार) का हवाला देते हुए इस पर सवाल उठाए।
संसद के पास है कानून बनाने की शक्ति
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि संविधान का अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता तो देता है, लेकिन साथ ही सरकार को यह शक्ति भी देता है कि वह सामाजिक सुधार के लिए कानून बना सके। जैसे यदि कोई मंदिर किसी खास जाति के लोगों को प्रवेश से रोकता है, तो सरकार कानून बनाकर उन्हें हक दिला सकती है। अदालत ने कहा कि यदि कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक और भेदभावपूर्ण है, तो संसद को उस पर कानून बनाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस संवेदनशील मुद्दे पर पहले दिन करीब पांच घंटे तक विस्तार से सुनवाई की। केंद्र सरकार ने यह भी सुझाव दिया कि अगर कोई प्रथा गलत लगती है, तो उसका समाधान संसद या विधानसभा को करना चाहिए, न कि कोर्ट को।
फिलहाल, इस मामले में बहस जारी है और कोर्ट यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।