ब्रज से लेकर काशी तक होली की कथाएं
संवाददाता
11 March 2025
अपडेटेड: 4:29 PM 0thGMT+0530
ब्रज से लेकर काशी तक होली की कथाएं
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को होली मनाई जाती है भारत में मनाए जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली।
एक दिन पूर्व होलिका दहन करते हैं ।इसे छोटी होली भी कहते हैं।
इसके बाद अगले दिन रंगों से होली खेलने की परंपरा है, जो पूर्ण हर्षोल्लास के साथ अबीर गुलाल लगाकर, एक दूसरे को गले लगाकर मनाते हैं ।
होली बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाई जाती है।
पौराणिक कथाओं में सबसे प्रचलित है– प्रहलाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी।
इसके अलावा अन्य बहुत कथाएं हैं।
आज आपको कुछ कथाओं के बारे में बताएंगे।
पुराणों के अनुसार दानव राज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद था ,जो भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। वह दिन-रात भगवान विष्णु का जाप करता रहता। यह देख हिरण्यकश्यप प्रहलाद से क्रोधित रहते।
हिरण्यकश्यप की एक बहन थी होलिका ,जिसे वरदान था कि उसे अग्नि की ज्वाला में नहीं जल सकती। हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए ।होलिका ने ऐसा ही किया। किंतु हुआ बिलकुल विपरीत।
होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रहलाद अग्नि की ज्वाला से सकुशल निकल आया और उसे कुछ भी नुकसान नहीं हुआ ।
होली का पर्व यही संदेश देता है कि ईश्वर अच्छाई के साथ रहते हैं ,और अपने भक्त की रक्षा के लिए हमेशा उपस्थित रहते हैं ।
होली की एक अन्य कथा है, जो कामदेव से संबंधित है।
कथा इस प्रकार है
माता पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थी, किंतु शिव तपस्या में लीन थे। ऐसे में प्रेम के देवता कामदेव पार्वती की सहायता हेतु उपस्थित हुए। उन्होंने शिव पर पुष्प की बौछार कर दिया ।शिव अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया ।उनके क्रोध की अग्नि से कामदेव जलकर भस्म हो गए ।कामदेव के भस्म होने से उनकी पत्नी रति अत्यंत दुखी हुई और शिव से कामदेव को जीवित करने की प्रार्थना की।
शिव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका दहन किया जाता है ।और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार होली मनाया जाता है ।
एक अन्य कथा महाभारत के प्रसंग की है ।
इस कथा के अनुसार युधिष्ठिर को श्री कृष्ण ने बताया कि एक बार श्री राम के पूर्वज रघु के शासन में एक असुर महिला थी ,जिसे कोई नहीं मार सकता था । क्यों कि उसे एक वरदान प्राप्त था ।किंतु उसके अत्याचारों से सभी दुखी थे। एक बार गुरु वशिष्ठ ने बताया कि यदि बच्चे अपने हाथों में छोटे-छोटे टुकड़े देकर गांव के बाहर जाए और सूखी घास के साथ ढेर लगाकर जला दें, फिर उसके चारों तरफ परिक्रमा करें, नृत्य करें, ताली बजायें, ढोल, मंजीरा ,नगाड़े बजाए तो उसे मारा जा सकता है फिर ऐसा ही किया गया। और उसे एक उत्सव के रूप में रंगों को खेल कर मनाया गया, जो बुराई में जीत का प्रतीक है।
एक अन्य कथा श्री कृष्ण से संबंधित है श्री कृष्णा और पूतना की कथा से संबंधित है। श्री कृष्ण का होली से गहरा रिश्ता भी है।
पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस को श्री कृष्ण के गोकुल में होने का पता चला तो ,कंस ने पूतना को गोकुल में जन्म देने वाले सभी शिशुओं को मारने के लिए भेजा । पूतना स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराती। किंतु श्री कृष्ण सच्चाई समझ गए। उन्होंने दुग्धपान के समय ही पूतना का वध कर दिया। तभी से होली मनाने की मान्यता शुरू हुई। इसी खुशी में गोपियों ने उनके साथ होली खेली थी।
एक और कथा है काशी नगरी की …बनारस में रंगभरी एकादशी के दिन से होली का हुड़दंग शुरू हो जाता है… पूरे 6 दिनों तक यहां रंगभरी होली खेली जाती है…… कहते हैं भगवान शिव माता पार्वती को जब काशी लेकर आए थे.. तब सभी ने रंग गुलाल-अबीर के साथ होली खेलकर मां पार्वती का अभिनंदन किया ता…. लेकिन भगवान शिव अपने गणों औऱ भूत-प्रेतों, के साथ होली नहीं खेल पाए थे.. तो दूसरे दिन भूत-पिशाचों के साथ होली खेली थी… तब से ही काशी में ‘मसाने की होली’ मनाने की परंपरा शुरू हुई… काशी में देवों के देव महादेव भगवान शिव स्वयं होली खेलने आते हैं…
तो इस तरह से कई कथाएं हैं जो होली के पर्व को रंग बिरंगा बनाती हैं