चुनाव से पहले नीतीश सरकार का बड़ा दांव

बिहार सरकार ने आगामी
विधानसभा चुनावों से पहले एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सवर्ण आयोग को फिर से सक्रिय कर दिया है. इस आयोग का गठन आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों के कल्याण के लिए किया गया है. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बीजेपी-जेडीयू गठबंधन सरकार ने इस कदम से सामाजिक और सियासी समीकरणों को साधने की कोशिश की है. आयोग का उद्देश्य गरीब सवर्ण समुदायों को शिक्षा, रोजगार और अन्य क्षेत्रों में सहायता प्रदान करना है. इस फैसले ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है और इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

सवर्ण आयोग की स्थापना पहली बार 2011 में हुई थी लेकिन यह बाद में निष्क्रिय हो गया था. 2025 में इसे फिर से अधिसूचित किया गया है ताकि आर्थिक रूप से कमजोर उच्च जातियों की समस्याओं का समाधान किया जा सके. आयोग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 55 प्रतिशत उच्च जातियों के पास एक एकड़ से कम जमीन है और कई परिवार गरीबी, शिक्षा की कमी और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं. इस आयोग को अब इन समुदायों के लिए नई कल्याणकारी योजनाओं की सिफारिश करने का जिम्मा सौंपा गया है. इसमें शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति, कौशल विकास कार्यक्रम और छोटे स्तर के व्यवसायों के लिए वित्तीय सहायता जैसी योजनाएं शामिल हो सकती हैं.

नीतीश सरकार का यह कदम सवर्ण वोटरों को लुभाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. बिहार में उच्च जातियां जैसे भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ लंबे समय से सियासी रूप से प्रभावशाली रही हैं. हालांकि इन समुदायों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सरकारी योजनाओं का लाभ कम ही मिल पाता है. आयोग के पुनर्गठन से सरकार इन वर्गों की नाराजगी को दूर करने और उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही है. यह कदम खासकर तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब विपक्षी दल भी सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटे हैं.

इस फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. कुछ लोग इसे सामाजिक न्याय की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं जबकि कुछ इसे चुनावी लाभ के लिए उठाया गया कदम बता रहे हैं. विपक्षी दलों ने सरकार पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया है. दूसरी ओर सवर्ण समुदाय के नेताओं ने इस कदम का स्वागत किया है और इसे लंबे समय से उपेक्षित वर्गों के लिए राहत देने वाला बताया है. आयोग अब जल्द ही अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपेगा जिसके आधार पर नई योजनाएं लागू की जा सकती हैं. यह कदम बिहार की सियासत में कितना असर डालेगा यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा.