आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में सुप्रीम सुनवाई :कुत्ता काटेगा या नहीं कैसे पता चलेगा!

khabar pradhan

संवाददाता

8 January 2026

अपडेटेड: 2:25 PM 0thGMT+0530

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में सुप्रीम सुनवाई :कुत्ता काटेगा या नहीं कैसे पता चलेगा!




सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा -‘तो क्या बिल्लियां ले आए’

आवारा कुत्तों के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि कोई भी नहीं समझ सकता कि कुत्ता किस मूड में है । वह काटेगा या नहीं ,यह समझा नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल की उस दलील पर टिप्पणी की ,जिसमें उन्होंने कहा कि कुत्तों को यदि सहानुभूति से पेश आयें  तो कुत्ता हमला नहीं करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि स्कूलों अस्पतालों या अदालत के परिसर में आवारा कुत्ते क्यों होना चाहिए और ऐसी जगह से हटाने पर आपको क्या आपत्ति हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों का मामला:
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस मेहता और जस्टिस एनवी अंजरिया की स्पेशल बेंच ने इस मामले की सुनवाई की । सुप्रीम कोर्ट ने कि अदालत सभी पक्षों की बात सुनेगी । पीड़ितों की, नफरत करने वालों की और प्यार करने वालों की सभी की बात सुनी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि स्कूलों अस्पतालों या अदालत परिसर में आवारा कुत्ते क्यों होना चाहिये । पीठ ने कहा कि रोकथाम इलाज से बेहतर है । बेंच ने सिविल बॉडीज स्थानीय अथॉरिटीज की लापरवाही पर जमकर फटकार लगाई और कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों का पालन नहीं हो रहा ,जिससे समस्या बढ़ती जा रही है।

कोर्ट ने नवंबर 2025 के अपने आदेश का जिक्र किया ,जिसमें कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थानों अ,स्पतालों ट्रांसपोर्ट हब से कुत्तों को हटाने और शेल्टर में ट्रांसफर करने के निर्देश जारी किए थे । किंतु यह नियम लागू नहीं हो रहे।  जिससे बच्चे, बुजुर्ग और आम लोग खतरे में है । जस्टिस मेहता ने पूछा कि क्या मुर्गियों और बकरियों का जीवन नहीं है । हम सिर्फ कुत्तों पर ही क्यों फोकस कर रहे हैं । यह टिप्पणी उन दलीलों पर थी जो कहती है कुत्तों को भी जीने का अधिकार है।  जब डॉग लवर्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने तर्क दिया कि एबीसी नियमों को शक्ति से लागू करने में अधिकारियों की असफलता के कारण समस्या और भी बदतर हो गई है।

कपिल सिंबल का तर्क :

कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि ऐसी घटनाएं किसी भी क्षेत्र से सभी कुत्तों को हटाने का आधार नहीं बन सकती।  यदि एक बाघ  किसी व्यक्ति पर हमला करता है ,तो सभी बाघों को पिंजरे में बंद नहीं किया जा सकता।  इसके अलावा उसने यह भी कहा कि ऐसे स्थलों में बड़े पैमाने पर स्थानांतरण ,शारीरिक और आर्थिक रूप से संभव नहीं है । यदि रैबीज से संक्रमित कुत्तों को स्वस्थ कुत्तों के साथ रखा जाएगा तो स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा हो सकता है।  कपिल सिब्बल ने सुझाव दिया कि जो रैबीज से पीड़ित और उपद्रवी कुत्ते हैं ,उन्हें पकड़ा जा सकता है उनकी नसबंदी की जा सकती है और फिर उन्हें छोड़ा जा सकता है ।
इसके जवाब में जस्टिस मेहता ने कहा कि फिर कुत्तों को भी सलाह दी जाए कि वह किसी को ना काटे।

कपिल सिब्बल ने दलील दी कि मंदिरों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर जाते समय उन्हें कभी किसी जानवर ने नहीं काटा । इस पर बेंच ने व्यंग्यात्मक लहजे में किन्तु गंभीर लहजे में कहा कि आप खुश किस्मत हैं कि आपको किसी ने नहीं काटा।  किंतु बच्चों को, बुजुर्गों को कुत्तों द्वारा काटा जा रहा है और लोग मर भी रहे हैं।

पीठ ने यह भी कहा की कुत्तों का व्यवहार पढ़ना मुश्किल है।  यह कैसे समझ में आएगा कि कुत्ता काटने के मूड में है या नहीं।

आवारा कुत्तों के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दाखिल सभी याचिकाओं पर संज्ञान लेते हुए कहा कि देश में लोग सिर्फ कुत्तों के काटने से ही नहीं ,बल्कि सड़कों पर घूमते आवारा जानवरों की वजह से भी हादसों भी जानवर रहे हैं । यह घटनाएं हो रही हैं बच्चे और बड़े कुत्तों के काटने के शिकार हो रहे हैं । यह मुद्दा बेहद गंभीर है।  पिछले 20 दिन में ऐसी दो सड़क दुर्घटनाएं जजों के साथ हुई है।  इनमें से एक जज अभी रीढ़ की गंभीर चोट से जूझ रहे हैं । कोर्ट ने कहा कि कोई नहीं जानता कि कुत्ता किस मूड में होगा । वह किसी को काटेगा या नहीं।  यह कैसे पता चल सकता है।
नगर निगम और स्थानीय निकाय एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) नियमों को लागू नहीं कर सके हैं । जबकि उन्हें सख्ती से इस नियम को लागू करना होगा।
कोर्ट ने सभी राज्यों से कहा कि वह एबीसी नियमों को लागू करने ,उनके पालन संबंधी हलफनामा दाखिल करें।  इसमें उन्हें कुत्तों की संख्या, नसबंदी ,टीकाकरण ,शेल्टर सुविधाओं आदि का ब्योरा देना होगा।  इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी और निजी शैक्षणिक स्वास्थ्य संस्थानों को 8 सप्ताह के भीतर फेसिंग  करानी होगी।
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, पंजाब जैसे बड़े राज्यों ने अब तक हलफनामे नहीं दिए हैं।  मामले की सुनवाई आज गुरुवार को भी जारी रहेगी।

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