बांग्लादेश में सियासी तूफान…
संवाददाता
24 May 2025
अपडेटेड: 7:08 AM 0thGMT+0530
Political storm in Bangladesh:
यूनुस की सत्ता की जंग और शाहबाग की नई चाल
बांग्लादेश की सियासत इन दिनों उबाल पर है। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस, जो अंतरिम सरकार के प्रमुख हैं, पर बिना चुनाव के सत्ता को अपने हाथ में रखने का आरोप लग रहा है। दूसरी ओर, बांग्लादेशी सेना ने सख्त चेतावनी दी है कि अगर जल्द चुनाव नहीं हुए, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। इस बीच, कट्टरपंथी समूहों ने ‘शाहबाग रणनीति’ के तहत सड़कों पर उतरने की तैयारी कर ली है। आइए, इस सियासी ड्रामे को करीब से देखें और समझें कि बांग्लादेश किस रास्ते पर बढ़ रहा है।
सत्ता का खेल: यूनुस की कुर्सी पर खतरा
मोहम्मद यूनुस, जिन्हें दुनिया माइक्रोफाइनेंस के जनक के तौर पर जानती है, आज बांग्लादेश में एक विवादास्पद शख्सियत बन गए हैं। उनकी अंतरिम सरकार पर आरोप है कि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सत्ता को लंबे समय तक अपने पास रखना चाहती है। यूनुस का दावा है कि वह देश में सुधारों के लिए समय चाहते हैं, मगर विपक्ष और जनता का एक बड़ा वर्ग इसे सत्ता की भूख मान रहा है। बांग्लादेश, जो पहले ही आर्थिक संकट और सामाजिक अशांति से जूझ रहा है, अब और गहरे संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है।
सेना की हुंकार: ‘चुनाव कराओ, वरना…’
बांग्लादेशी सेना ने यूनुस सरकार को कड़ा संदेश दे दिया है। सेना प्रमुख वकार-उज़-ज़मान ने साफ कहा कि अगर दिसंबर 2025 तक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव नहीं कराए गए, तो अंतरिम सरकार की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। ढाका की सड़कों पर सेना की बढ़ती मौजूदगी ने तख्तापलट की आशंकाओं को और हवा दी है। सेना का यह रुख बांग्लादेश की सियासत में नया नहीं है, क्योंकि इतिहास में सेना कई बार सत्ता के खेल में दखल दे चुकी है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या यूनुस इस दबाव के सामने झुकेंगे?
शाहबाग रणनीति: कट्टरपंथियों की नई चाल
कट्टरपंथी समूहों ने ‘शाहबाग रणनीति’ के नाम से एक नया आंदोलन शुरू किया है, जिसका मकसद यूनुस को सत्ता से हटाना और तत्काल चुनाव करवाना है। यह रणनीति 2013 के शाहबाग आंदोलन से प्रेरित है, जब युवाओं और छात्रों ने सड़कों पर उतरकर अपनी मांगें मनवाने की कोशिश की थी। इस बार कट्टरपंथी ताकतें यूनुस सरकार के खिलाफ जनता को लामबंद करने की कोशिश में हैं। सोशल मीडिया पर भी इस रणनीति को लेकर चर्चा जोरों पर है, जहां कुछ लोग इसे लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं, तो कुछ इसे अराजकता की शुरुआत मान रहे हैं।
क्या है बांग्लादेश का भविष्य?
यूनुस की अंतरिम सरकार, सेना की सख्ती, और कट्टरपंथी समूहों की उग्र रणनीति के बीच बांग्लादेश एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। अगर यूनुस जल्द चुनाव कराने में नाकाम रहे, तो देश में हिंसा और अस्थिरता बढ़ सकती है। वहीं, सेना की चेतावनी और कट्टरपंथी आंदोलन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। क्या यूनुस अपनी साख बचाते हुए देश को स्थिरता दे पाएंगे, या बांग्लादेश एक बार फिर सियासी उथल-पुथल का शिकार होगा? यह सवाल हर किसी के जेहन में है।