22 जुलाई 2026:
खबर प्रधान डेस्क:
चातुर्मास 4 महीने का एक पवित्र समय होता है। जिसमें व्रत और विशेष नियमों का पालन किया जाता है ।इस अवधि में भगवान की विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
चातुर्मास अर्थात चार माह की अवधि– हिन्दू धर्म में एक विशेष आध्यात्मिक अवधि है, जो वर्षा ऋतु के दौरान मनाई जाती है।
यह चार महीने की अवधि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) देवउठनी एकादशी तक चलती है। चार महीना का समय चातुर्मास कहलाता है। चातुर्मास के महत्व के बारे में शास्त्रों में वर्णन है कि इन चारों मास में श्री नारायण विष्णु भगवान और सभी देव देवता योग निद्रा में रहते हैं और इसमें कोई भी शुभ कार्य और कोई भी यज्ञ करने या कोई मंगल कार्य वर्जित होते हैं। इस दौरान सूर्य भी दक्षिणायन होते हैं इस कारण भी मंगल कार्य संभव नहीं हो पाए।
इस समय को देवताओं की “निद्रा अवधि” (देव शयन) माना जाता है। इन्हीं 4 माह में बहुत सारे पवित्र त्यौहार भी आते हैं l
चातुर्मास की क्या है मान्यता:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु इन चार महीनों में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान वे पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ निवास करते हैं। चातुर्मास का उल्लेख स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, महाभारत और अन्य ग्रंथों में मिलता है l
इस समय साधु-संत एक स्थान पर ठहरकर तपस्या, अध्ययन और प्रवचन करते हैं।
गृहस्थ लोग भी संयम, ब्रह्मचर्य, और भक्ति का पालन करते हैं।
यह काल आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर है।
हिंदू धर्म में चातुर्मास को अत्यंत पुण्यदायक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समय व्रत, उपवास, दान, जप-तप और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आदर्श है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस अवधि में किए गए पुण्यकर्मों का फल कई गुना अधिक मिलता है।
चातुर्मास में क्या करें और क्या न करें!
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• सत्संग और ध्यान – आत्मिक उन्नति के लिए उपयुक्त समय है।
• भजन, कीर्तन, जप, पाठ – विष्णु सहस्त्रनाम, नारायण कवच, श्री सूक्त, गीता, रामायण आदि का पाठ करें।
• दान-पुण्य – अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान आदि करें।
• ब्राह्मणों और संतों की सेवा करें।
क्या न करें:
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• विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं होते।
• नए वस्त्र, गहने खरीदना या पहनना वर्जित माना जाता है।
• ब्रह्मचर्य का पालन करें – संयमित जीवन जीएं।
• नकारात्मक विचारों, क्रोध, आलस्य, अधिक निद्रा से बचें।
चातुर्मास में खानपान कैसा रखें!
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क्या न खाएं:
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• प्याज, लहसुन
• मांस, मछली, अंडा
• शराब, तंबाकू
• दही (विशेषकर श्रावण में)
• अधिक तले-भुने और गरिष्ठ भोजन
• बैगन, हरी पत्तेदार सब्जियां
क्या खाएं:
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• सात्विक भोजन: फल, दूध, मूंग दाल, साबूदाना, कुट्टू
• उपवास में फलों और सूखे मेवों का सेवन
• तुलसी के पत्तों का सेवन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।
भारत के विभिन्न प्रांतों में चातुर्मास मनाने के तरीके!
1..उत्तर भारत:
• वृंदावन, काशी, अयोध्या जैसे तीर्थों में संतों का ठहराव होता है
• रामचरितमानस, श्रीमद्भागवत पाठ का आयोजन
• झूला उत्सव और राधा-कृष्ण लीलाओं का आयोजन
2..पश्चिम भारत (महाराष्ट्र, गुजरात):
• व्रत और उपवास विशेष रूप से श्रावण सोमवार और हरतालिका तीज
• संत तुकाराम और ज्ञानेश्वर की शिक्षाओं का अनुसरण
• लोकसंगीत और कीर्तन मंडल सक्रिय रहते हैं
3..दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश):
• वेदपाठ, उपनिषद अध्ययन, गुरु पूजन
• ब्राह्मण परिवारों में विशेष पूजा और यज्ञ
• आषाढ़ एकादशी से पहले “अनुष्ठान प्रारंभ” की परंपरा
4..पूर्व भारत (बंगाल, ओडिशा, असम):
• जगन्नाथ रथ यात्रा से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है।
• पौराणिक कथाओं का पाठ, व्रत, पूजा
• पितृ पक्ष और दुर्गा पूजा की तैयारी भी इसी समय होती है
चातुर्मास केवल व्रत या नियमों का समय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, सांस्कृतिक अनुशासन और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। यह समय आत्ममंथन, संयम, सेवा और साधना का है। यदि इन चार महीनों का सही ढंग से पालन किया जाए, तो यह जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।


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