भक्तों की आस्था के प्रतीक ये 10 देवी मंदिर: एमपी की आध्यात्मिक धरोहर.
संवाददाता
19 March 2026
अपडेटेड: 7:20 PM 0thGMT+0530
19 मार्च 2026
1.. माँ शारदा मैहर।
मध्यप्रदेश के मैहर में त्रिकूट पर्वत की लगभग 600 फीट ऊंचाई पर स्थित मां शारदा का मंदिर देश के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 1063 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, हालांकि यहां रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है।
मंदिर परिसर में मां शारदा के साथ-साथ मां काली, दुर्गा, गौरी-शंकर, शेषनाग, काल भैरव और हनुमान जी के भी दर्शन किए जा सकते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।
मान्यता है कि मां शारदा के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना से ज्ञान, बुद्धि और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
2..माँ चामुण्डा देवास l
मध्यप्रदेश के देवास में टेकरी पर स्थित मां चामुंडा का मंदिर 52 शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान पर मां सती के रक्त की बूंदें गिरी थीं, जिससे यह स्थल अत्यंत पवित्र माना जाता है।
टेकरी पर मां चामुंडा के साथ-साथ मां तुलजा भवानी का मंदिर भी स्थित है, जहां श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि के दौरान यहां विशेष रूप से भारी भीड़ देखने को मिलती है और भक्त पहाड़ी चढ़कर मां के दर्शन करते हैं।
यह धाम शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जहां श्रद्धालु अपनी बाधाओं के नाश और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। माना जाता है कि सच्ची श्रद्धा से मां के दरबार में की गई प्रार्थना अवश्य पूर्ण होती है।
3.. कवलका माता मंदिर रतलाम.
मध्यप्रदेश के रतलाम में स्थित लगभग 300 वर्ष पुराना श्री कवलका माता मंदिर अपनी विशेष और अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां मां काली और काल भैरव की प्रतिमाओं को मदिरा का भोग लगाया जाता है, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाता है।
मान्यता है कि मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियां भक्तों द्वारा अर्पित मदिरा को स्वीकार करती हैं, जिसे लोग चमत्कार के रूप में देखते हैं। इस अनोखी परंपरा के कारण यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा और भोग का आयोजन किया जाता है, जिससे भक्तों की आस्था और अधिक प्रगाढ़ हो जाती है।
4..श्री पीताम्बरा पीठ दतिया.
मध्यप्रदेश के दतिया में स्थित पीतांबरा पीठ मां बगलामुखी का अत्यंत पवित्र धाम माना जाता है। इसकी स्थापना 1920 के दशक में हुई थी और इसे एक प्रमुख तपोस्थली के रूप में भी जाना जाता है।
यह मंदिर ग्वालियर से लगभग 75 किलोमीटर और झांसी से करीब 29 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मां बगलामुखी का यह स्थान विशेष रूप से शत्रु नाश और वाक् सिद्धि के लिए प्रसिद्ध है, जहां भक्त अपनी समस्याओं के समाधान और विजय की कामना लेकर आते हैं।
नवरात्रि के दौरान यहां विशेष यज्ञ और पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि मां बगलामुखी की कृपा से श्रद्धालुओं को विजय और सफलता प्राप्त होती है।
5..विजयासन देवी सलकनपुर.
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 70 किलोमीटर दूर सीहोर जिले के सलकनपुर में विंध्याचल पर्वत पर विजयासन देवी का भव्य मंदिर स्थित है। पर्वत पर विराजमान होने के कारण देवी को ‘निवासी देवी’ के नाम से भी जाना जाता है।
मान्यता है कि सलकनपुर वाली माता विजयासन देवी, माता पार्वती का ही अवतार हैं। यह मंदिर करीब 1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
जानकारी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण लगभग 1120 के आसपास गोंड राजाओं द्वारा कराया गया था। यह स्थान प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है, जहां भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं।
6.. कालमाधव शक्तिपीठ अमरकंटक.
मध्यप्रदेश के अमरकंटक में स्थित कालमाधव मंदिर मां सती के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और यह देवी दुर्गा को समर्पित है। नर्मदा नदी के उद्गम के समीप स्थित यह पवित्र स्थल भक्तों को गहरी आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां विशेष धार्मिक माहौल देखने को मिलता है, जब प्रकृति की सुंदरता और श्रद्धालुओं की आस्था का अद्भुत संगम दिखाई देता है। बड़ी संख्या में भक्त इस दौरान दर्शन के लिए पहुंचते हैं और मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं l
7.. हरसिद्धि माता मंदिर उज्जैन.
मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित हरसिद्धि मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती की कोहनी गिरी थी, जिससे यह स्थान अत्यंत पवित्र बन गया है।
मराठा वास्तुकला से प्रभावित यह मंदिर अपने आकर्षक दीप स्तंभों के लिए भी प्रसिद्ध है, जिन्हें विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान सजाया जाता है। इस समय मंदिर का दृश्य बेहद भव्य और मनमोहक हो जाता है।
मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यहां उमड़ने वाली भीड़ और आस्था का माहौल हर किसी को आश्चर्यचकित कर देता है
8.. अन्नपूर्णा मंदिर इंदौर.
शहर के रेलवे स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित अन्नपूर्णा मंदिर श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1959 में स्वामी प्रणवानंद गिरी द्वारा कराया गया था।
मां अन्नपूर्णा को भोजन और समृद्धि की देवी माना जाता है। यहां श्रद्धालु भक्ति भाव से दर्शन करने पहुंचते हैं और मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। इस समय भक्त अन्नदान और पूजा-अर्चना करते हैं तथा मां अन्नपूर्णा की कृपा से अपने घर-परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
9..मान्ढरे की माता ग्वालियर.
शहर के कंपू क्षेत्र में स्थित कैंसर पहाड़ी पर बना 147 वर्ष पुराना यह मंदिर श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। इसका निर्माण महाराज जयजी राव सिंधिया द्वारा कराया गया था, जो आज भी भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
मंदिर में अष्टभुजा महिषासुर मर्दिनी मां महाकाली की दिव्य प्रतिमा मुख्य आकर्षण का केंद्र है, जिसे देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। मंदिर की भव्य वास्तुकला और शांत वातावरण भक्तों को विशेष रूप से आकर्षित करता है।
नवरात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में भक्त मां के दरबार में पहुंचकर उनकी आराधना करते हैं और अपनी सुरक्षा व सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
10.. कर्फ्यू वाली माता भोपाल.
राजधानी में स्थित ‘कर्फ्यू वाली माता’ मंदिर का नाम वर्ष 1981 में हुई एक खास घटना के बाद पड़ा। उस समय अश्विन माह की नवरात्रि में जयपुर से लाई गई माता की मूर्ति को सोमवार चौराहे के पास एक चबूतरे पर स्थापित किया जा रहा था।
मूर्ति स्थापना के दौरान विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके चलते प्रशासन को पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू लगाना पड़ा। यह कर्फ्यू करीब एक महीने तक चला, जिससे स्थिति काफी संवेदनशील बनी रही।
आखिरकार लंबे विरोध और हालात को देखते हुए सरकार को झुकना पड़ा और मंदिर की स्थापना की अनुमति दे दी गई। इसी घटना के बाद से यह मंदिर ‘कर्फ्यू वाली माता’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
