यूपी में दलित वोट पर जंग: कौन सी है वो 84 सीटें:

khabar pradhan

संवाददाता

9 January 2026

अपडेटेड: 9:49 PM 0thGMT+0530

यूपी में दलित वोट पर जंग: कौन सी है वो 84 सीटें:




यूपी/उत्तर प्रदेश में दलित वोटों पर राजनीति:
यूपी की राजनीति में सत्ता की चाबी उसी को ही मिलती है जो सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों का  धुरंधर हो ।जातियों की राजनीति में महारत हो। सपा  ने 24 के चुनाव में पीडीए लाकर बड़ा खेल कर दिया था। लेकिन फिलहाल पिछले दो बार से सपा की स्ट्रैटजी हाशिए पर है। कई जानकार तो इसे पार्टी का डाउनफॉल बताते हैं।
लेकिन राजनीति में  वक्त बड़ा बलवान होता है ।
हार जीत तभी मिलती है जब आपका वक्त साथ न दें।
ऐसे में सहयोगी साथी भी साथ छोड़ जाते हैं।क्षलेकिन सपा भी सोच रही है आखिर कब तक सिर्फ हार ही मिलती रहेगी। हालांकी 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी को मोटिवेशनल बूस्टर जरूर मिला। लेकिन भला उस बूस्टर डोज का असर भी कम हो चला है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।  सत्ता में वापसी के लिए समाजवादी पार्टी अब कोई भी मौका छोड़ने के मूड में नहीं दिख रही है। अखिलेश यादव की नजर उस वोटबैंक पर है, जो लंबे समय तक बहुजन समाज पार्टी की ताकत रहा है यानी दलित वोट बैंक।

2027 की जंग को लेकर समाजवादी पार्टी ने अभी से बड़ा दांव खेलने की तैयारी कर ली है। पार्टी का साफ मानना है कि अगर बसपा के कोर वोटबैंक में सेंध लगाई जा सके, तो उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ बीजेपी को कड़ी चुनौती देना आसान हो जाएगा। इसी रणनीति के तहत सपा ने दलित राजनीति को अपने केंद्र में ला दिया है।

अखिलेश यादव की रणनीति क्या है?

समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनावों में सिर्फ आरक्षित सीटों तक ही सीमित नहीं रहना चाहती।
सपा का प्लान है कि आम सीटों पर भी बड़े पैमाने पर दलित उम्मीदवारों को टिकट दिया जाए। अब इसका मकसद साफ है जातीय समीकरणों को पूरी तरह से बदल देना और बसपा के पारंपरिक वोटबैंक को अपनी ओर खींचना। लेकिन इस वोटबैंक के साथ एक दिक्कत है। और वो ये कि वोटबैंक काफी ज्यादा बिखरा हुआ है। कई दलित चंद्रशेखर के साथ हैं,कई मायवती तो कई कांग्रेस.।

यहां तक की भाजपा के पास भी इस वोटबैंक का कुछ प्रतिशत है। हालांकी सपा की ये रणनीति अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले का अहम हिस्सा है।

PDA का फार्मूला:

पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक। अखिलेश यादव का मानना है कि अगर इन तीनों वर्गों को एकजुट कर लिया जाए, तो यूपी की सत्ता का रास्ता अपने आप खुल सकता है।  हाल ही में अखिलेश यादव खुद कह चुके हैं कि, पीडीए ही यूपी का भविष्य है और  यही सोच अब पार्टी की चुनावी रणनीति का आधार बन चुकी है।

दरअसल, समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनावों से कई अहम सबक लिए हैं। पार्टी को महसूस हुआ कि लोकसभा चुनावों में दलित वोटों का एक हिस्सा सपा की ओर शिफ्ट हुआ था।श्र हालांकि विधानसभा चुनावों में इस समर्थन को स्थायी बनाने के लिए अभी और मेहनत की जरूरत है। इसी वजह से सपा अब जमीन स्तर पर दलित समुदाय के बीच भरोसा मजबूत करने में जुट गई है। अब अगर आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं, जिनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं।  लेकिन समाजवादी पार्टी का फोकस सिर्फ इन्हीं 84 सीटों तक सीमित नहीं है।  सपा की कोशिश है कि सामान्य सीटों पर भी दलित चेहरों को उतारकर बसपा के वोटबैंक में सीधी सेंध लगाई जाए। आपतो बता दें कि इसी रणनीति के चलते पार्टी ने 2025 से ‘पीडीए चर्चा’ कार्यक्रम शुरू किए हैं।‌ये कार्यक्रम यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर चलाए जा रहे हैं।  इन बैठकों और संवाद कार्यक्रमों में दलित समुदाय से जुड़े मुद्दों को खास तौर पर उठाया जा रहा है—जैसे शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय और सम्मान। पार्टी का मानना है कि इन मुद्दों पर लगातार संवाद से दलित मतदाताओं का भरोसा जीता जा सकता है।

ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये दांव पूरी तरह सुरक्षित है क्योंकि हर एक्शन का रिएक्शन होता है। अब इसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी की ये रणनीति जोखिम भरी भी हो सकती है। क्योंकि सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों को टिकट देने से सपा के परंपरागत ऊंची जातियों के वोट खिसकने का खतरा बना रह सकता है।  अगर ऐसा हुआ, तो पार्टी को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में मिले संकेतों से सपा उत्साहित है। पार्टी को भरोसा है कि अगर दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा उसके साथ जुड़ गया, तो यूपी की सियासत में बड़ा उलटफेर संभव है।

…समाजवादी पार्टी 2027 के चुनाव को लेकर बेहद गंभीर है… अखिलेश यादव की पीडीए रणनीति यूपी की जातीय राजनीति को नई दिशा दे सकती है…लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि भला सपा वोट कटुआ की भूमिका में क्यों आ गई तो इसका जवाब भी साफ है। दरअसल,दलितों को खुश करने का चलन काफी ज्यादा पुराना है‌क्षपुराने नतीजों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2007 में बसपा जब अपने दम पर सरकार में आई थी. तब उसने दलित अतिपिछड़ा और मुस्लिम समीकरण अपनाया था।

और बसपा 2027 में एक बार फिर से इसी सियासी केमिस्ट्री को दोहराने की कोशिश कर रही है।‌
तो अब देखना होगा 84 की चौखट में क्या सपा देगी दस्तक या फिर योगी बाबा इन पर पानी फेरने की करेंगे तैयारी।

टिप्पणियां (0)