13 अप्रैल 2026
नई दिल्ली:
दिल्ली हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की एक महिला प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के साथ सिर्फ बुरा व्यवहार या बदतमीजी करना इस विशेष कानून के तहत अपराध की श्रेणी में तब तक नहीं आता, जब तक कि वह जाति के आधार पर अपमानित करने की मंशा से न किया गया हो।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज की दो महिला एसोसिएट प्रोफेसरों के बीच अगस्त 2021 में हुई एक बहस से शुरू हुआ था। याचिका के अनुसार, 16 अगस्त 2021 को कॉलेज के हिंदी विभाग की एक बैठक हो रही थी। आरोप है कि जब एक प्रोफेसर ने दूसरी प्रोफेसर से बैठक के मिनट्स (अभिलेख) पर हस्ताक्षर करने को कहा, तो विवाद बढ़ गया।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि दूसरी प्रोफेसर ने रजिस्टर छीनने की कोशिश की, उनके बाल खींचे और रजिस्टर का पन्ना फाड़ दिया। इस घटना के बाद 23 अगस्त 2021 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कई अहम बातें कहीं:
जातिगत मंशा जरूरी: अदालत ने साफ किया कि एससी-एसटी कानून की धारा-3 के तहत अपराध तभी बनता है जब यह स्पष्ट हो कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की नीयत से कार्य किया हो।
सिर्फ बदतमीजी काफी नहीं: कोर्ट ने कहा कि किसी के साथ दुर्व्यवहार करना निंदनीय हो सकता है, लेकिन अगर उसमें जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल या जातिगत भेदभाव की भावना नहीं है, तो उसे इस अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
शिकायत में विरोधाभास: अदालत ने गौर किया कि घटना 17 अगस्त को कॉलेज प्रिंसिपल और पुलिस को बताई गई थी, लेकिन उस शुरुआती शिकायत में जातिगत टिप्पणी का कोई जिक्र नहीं था। जाति से जुड़ी बातों को छह दिन बाद दर्ज कराई गई एफआईआर में जोड़ा गया, जिसे कोर्ट ने संदिग्ध माना।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसे कोई तथ्य नहीं मिले जिनसे यह साबित हो कि आरोपी ने शिकायतकर्ता की जाति जानते हुए उसे जानबूझकर अपमानित किया। अदालत के अनुसार, शिकायत में जातिवादी टिप्पणियों का जिक्र केवल अस्पष्ट और सामान्य शब्दों में किया गया था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने प्रोफेसर के खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया।


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