21 मई 2026
बालेश्वर:
‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत निजी क्षेत्र की कंपनी नीबे लिमिटेड ने सेना के ऑर्डर पर तैयार किया बेहद सटीक रॉकेट।
बालेश्वर (ओडिशा) से भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए एक बेहद शानदार और गर्व करने वाली खबर सामने आई है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने की दिशा में देश को एक और बड़ी कामयाबी मिली है। ओडिशा के चांदीपुर में स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (ITR) में लंबी दूरी के घातक ‘सूर्यास्त्र’ रॉकेट सिस्टम का सफल परीक्षण किया गया है।
यह परीक्षण इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि इसे निजी क्षेत्र की प्रमुख रक्षा कंपनी ‘नीबे लिमिटेड’ द्वारा विकसित किया गया है। यह टेस्ट भारतीय सेना की ओर से कंपनी को दिए गए खरीद ऑर्डर (Purchase Order) के तहत किया गया है।
150 और 300 किलोमीटर की रेंज में अचूक निशाना
बीते 18 और 19 मई को हुए इन परीक्षणों के दौरान ‘सूर्यास्त्र’ रॉकेट सिस्टम के दो अलग-अलग वर्जन का टेस्ट किया गया। इनमें से एक रॉकेट की मारक क्षमता 150 किलोमीटर और दूसरे की 300 किलोमीटर है। दोनों ही रॉकेटों ने अपने तय लक्ष्यों पर बिल्कुल सटीक प्रहार करके अपनी ताकत और काबिलियत साबित कर दिखाई।
इतनी दूरी पर भी सटीकता देख हैरान रह जाएंगे आप
इस रॉकेट की सबसे बड़ी खूबी इसकी अचूक सटीकता (Accuracy) है। रक्षा क्षेत्र की भाषा में कहें तो:
* 150 किलोमीटर की रेंज वाले रॉकेट ने सिर्फ 1.5 मीटर की सर्कुलर एरर प्राबेबिलिटी (सीईपी / CEP) हासिल की।
* 300 किलोमीटर की लंबी दूरी वाले वर्जन ने महज 2 मीटर की सीईपी (CEP) दर्ज की।
सरल शब्दों में इसका मतलब यह हुआ कि 300 किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन पर जब यह रॉकेट दागा जाएगा, तो यह अपने मुख्य पॉइंट से केवल 2 मीटर के दायरे के भीतर ही गिरेगा, जो कि इतनी लंबी दूरी के मिसाइल या रॉकेट सिस्टम के लिए बेहद सटीक और बेहतरीन माना जाता है।
क्या है इसके पीछे की तकनीक?
‘सूर्यास्त्र’ रॉकेट प्रणाली को इस तरह डिजाइन और विकसित किया गया है कि यह बहुत लंबी दूरी से भी दुश्मन के बेहद महत्वपूर्ण और सुरक्षित ठिकानों को पलक झपकते ही तबाह कर सके। इस प्रणाली को बनाने में इजरायली रक्षा कंपनी ‘एल्बिट सिस्टम्स’ की प्रिसिजन एंड यूनिवर्सल लॉन्चिंग सिस्टम (पल्स) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
यह पूरी तरह से भारतीय संस्करण (Indian Version) है, जिसे नीबे लिमिटेड ने मिलकर तैयार किया है। इस पूरी परियोजना में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर (तकनीकी हस्तांतरण) पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है, ताकि भविष्य में भारत को ऐसे घातक हथियारों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े।


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