20 अप्रैल 2026
नई दिल्ली:
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक सुलह की एक कोशिश को बड़ा झटका लगा है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह मंगलवार से पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता में शामिल नहीं होगा। ईरान के इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मच गया है, क्योंकि इस बातचीत से उम्मीद जताई जा रही थी कि दोनों देशों के बीच बिगड़े हालात थोड़े संभलेंगे।
ईरान की आधिकारिक सरकारी न्यूज एजेंसी के मुताबिक, ईरान प्रशासन का मानना है कि इस बातचीत का फिलहाल कोई मतलब नहीं है। उनका तर्क है कि एक तरफ अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अपनी नौसेना तैनात कर कड़ी नाकेबंदी कर रखी है और दूसरी तरफ वह ईरान पर लगातार अनुचित मांगें थोप रहा है। ईरान का सीधा कहना है कि जब तक अमेरिका अपनी नौसेना को वहां से नहीं हटाता और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाना बंद नहीं करता, तब तक किसी भी तरह की चर्चा संभव नहीं है।
अमेरिका और पाकिस्तान का रुख
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को बड़ी उम्मीद के साथ घोषणा की थी कि शांति वार्ता मंगलवार से शुरू होने जा रही है। ट्रंप ने इसे ईरान के लिए एक आखिरी मौके की तरह बताया था। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
इस वार्ता को सफल बनाने के लिए अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और पश्चिम एशिया के विशेष दूत स्टीव विटकाफ के साथ जेरेड कुशनर भी सोमवार शाम तक इस्लामाबाद पहुंचने वाले थे। वहीं पाकिस्तान इस पूरे मामले में एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने ईरान के साथ संवाद बनाए रखने पर जोर दिया है, ताकि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।
ईरान की शर्त
ईरान के विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि वे बातचीत के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन वे दबाव में झुककर कोई समझौता नहीं करेंगे। उनके अनुसार:
1. अमेरिका को सबसे पहले होर्मुज के इलाके से अपनी नौसेना की घेराबंदी खत्म करनी होगी।
2. ट्रंप प्रशासन को अपनी शर्तें नरम करनी होंगी।
3. जब तक अमेरिका अपना आक्रामक रुख नहीं बदलता, ईरान वार्ता की मेज पर नहीं लौटेगा।
फिलहाल इस्लामाबाद और रावलपिंडी में प्रस्तावित बैठकों की तैयारियां तो चल रही हैं, लेकिन ईरान के इनकार के बाद इन बैठकों के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है। व्हाइट हाउस ने अभी तक ईरान के इस ताजा रुख पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अगर यह वार्ता रद्द होती है, तो खाड़ी देशों में तनाव और अधिक बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक तेल बाजार और सुरक्षा पर भी पड़ेगा।


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