भोजशाला: एएसआई की रिपोर्ट- छेनी हथौड़े से मिटाए गए मंदिर के सबूत

khabar pradhan

संवाददाता

26 February 2026

अपडेटेड: 2:47 PM 0thGMT+0530

भोजशाला: एएसआई की रिपोर्ट- छेनी हथौड़े से मिटाए गए मंदिर के सबूत

इतिहास, आस्था और कानून के बीच उलझा भोजशाला मामला
मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। एएसआई की सर्वे रिपोर्ट और अलग-अलग पक्षों के बयानों के बाद इस मुद्दे ने नया मोड़ ले लिया है। हिंदू पक्ष इसे प्राचीन मंदिर और देवी सरस्वती का स्थान मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।  ASI के सर्वे में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है, कि प्राचीन मंदिर की शिलाओं और खभों की पहचान छुपाने की कोशिश की गई थी l मंदिर के शिलालेखों और देवी देवताओं की आकृतियों को छैनी हथोड़े से जानबूझकर नष्ट किया गया, ताकि उनकी मूल पहचान को मिटाया जा सकेl निर्माण में इतनी जल्दबाजी दिखाई गई कि, ना तो डिजाइन का ध्यान रखा गया और ना ही समरूपता का l फर्श और दीवारों में पत्थर लगाते समय यह भी ध्यान नहीं रखा गया कि उन पर खुदे प्राचीन शिलालेख उल्टे या आड़े तिरछे लग रहे हैं l

एएसआई सर्वे में मंदिर स्थापत्य के संकेत, दावा हुआ मजबूत
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की जांच में परिसर में कई प्राचीन स्तंभ, मूर्तिकला और मंदिर शैली की संरचनाएं मिलने की बात सामने आई है। रिपोर्ट में शिलालेख, नक्काशी और स्थापत्य तत्वों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें कुछ विशेषज्ञ मंदिर परंपरा से जोड़ रहे हैं। इससे हिंदू पक्ष का दावा और मजबूत होने की बात कही जा रही है। खंभे पर सांपों के आकार वाले चित्र और व्याकरण से जुड़े जुड़े शिलालेख मिले हैं ,इनसे पता चलता है कि राजा भोज के समय यह पढ़ाई लिखाई का बड़ा केंद्र थाl वैज्ञानिक जांच के अनुसार इस जगह को तीन बार में बनाया गया, जो हिस्सा आज मस्जिद जैसा दिखता है वह सबसे बाद का हैl उसे एक पुराने क्षतिग्रस्त मंदिर के ऊपर बनाया गया है l फर्श और दीवारों में लगे पत्थरों पर लिखे गये अक्षरों को जानबूझकर घिस दिया गया था या उन्हें उल्टा लगा दिया गया था, ताकि उन्हें पढ़ा न जा सके l दीवारों पर युद्ध के दृश्य मिले हैं, जिनमें हाथी और सैनिक दिखाई देते हैं l दिलचस्प बात यह है कि वहां एक नन्हे बच्चों के हाथ का निशान भी मिला है  l खंभों पर 139 से अधिक प्रकार के निशान जैसे त्रिशूल स्वास्तिक मिले हैं, यह केवल धार्मिक चिह्न नहीं है ,बल्कि उस समय के कारीगरों के सिग्नेचर या कोड थे l

केके मोहम्मद का बयान बना चर्चा का केंद्र
पूर्व एएसआई अधिकारी केके मोहम्मद ने भी पहले कई मंचों पर यह कहा है कि देश के कुछ विवादित स्थलों पर मंदिर संरचनाओं के प्रमाण मिलते हैं। भोजशाला को लेकर उनके पुराने बयान फिर चर्चा में हैं। उनका कहना है यह तो तय थाl भोजशाला ही नहीं मथुरा और ज्ञानवापी भी हिंदुओं को दे देना चाहिए l लेकिन अब दोनों समुदायों को सोचना चाहिए कि विवाद आगे ना बढ़े, आर्कियोलॉजी को हर जगह हथियार की तरह इस्तेमाल न किया जाए l उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसे विवादों का समाधान संवाद और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, ताकि सामाजिक सौहार्द बना रहे।

मुस्लिम पक्ष की आपत्ति, अब्दुल समद ने उठाए सवाल
मौलाना कमालुद्दीन वाफ वेलफेयर सोसाइटी एवं सदर के अब्दुल समद और अन्य प्रतिनिधियों ने एएसआई की रिपोर्ट और कुछ दावों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है 2003 से आपत्ति दर्ज कर रहे हैं कि अंदर गलत तरीके से चीज लाकर रखी जा रही हैं हम सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएंगे यही आपत्ति करेंगे अभी 19034 के सर्वे से अलग तथ्य हैं l उनका कहना है कि इतिहास और पुरातत्व की व्याख्या संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया का सम्मान जरूरी है।

हाईकोर्ट की निगरानी में आगे की कार्रवाई
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट इस पूरे मामले की सुनवाई कर रहा है और आगे की प्रक्रिया न्यायिक निर्देशों के अनुसार तय की जाएगी। कोर्ट ने सभी पक्षों को संयम बनाए रखने और कानून व्यवस्था का पालन करने की अपील की है। प्रशासन ने भी क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी है, ताकि किसी प्रकार का तनाव न हो।

इतिहास और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि भोजशाला विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भी है। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक शोध, कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक संतुलन तीनों का ध्यान रखना जरूरी है। माना जा रहा है कि अदालत का अंतिम निर्णय इस लंबे विवाद की दिशा तय करेगा।

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