16 मई 2026
धार:
सरस्वती वंदना से लेकर हाई कोर्ट के फैसले तक:
धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला आ चुका है। इस फैसले के बाद जहां एक तरफ सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट पर हैं, वहीं दूसरी तरफ इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो साफ होता है कि यह पूरा मामला कैसे एक छोटे से धार्मिक कार्यक्रम से शुरू होकर मालवा क्षेत्र का सबसे बड़ा जनआंदोलन बन गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद (विहिप), बजरंग दल और हिंदू जागरण मंच जैसे संगठनों ने सालों तक लगातार अभियान चलाकर इस मुद्दे को गांव-गांव तक पहुंचाया था। आइए आसान भाषा में समझते हैं इस आंदोलन का पूरा इतिहास और फैसले के बाद राजधानी भोपाल के मौजूदा जमीनी हालात।
सन् 1994 से हुई आंदोलन की शुरुआत
दस्तावेजों और इतिहास के मुताबिक, इस आंदोलन की नींव सन् 1994 में पड़ी थी। तब धार के सामाजिक कार्यकर्ताओं और संघचालकों ने भोजशाला परिसर के भीतर मां सरस्वती की वंदना और हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू किया था। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने मिलकर इसे भोजशाला मुक्ति आंदोलन का रूप दे दिया।
आंदोलन के कुछ मुख्य पड़ाव और बड़ी घटनाएं
शौर्य दिवस कार्यक्रम (1996): 6 दिसंबर 1996 को बजरंग दल के बुलावे पर मध्य प्रदेश में राज्य स्तरीय शौर्य दिवस कार्यक्रम रखा गया था। प्रशासन ने इसे रोकने के लिए काफी कड़े कदम उठाए थे।
विहिप का केंद्रीय एजेंडा (1997): सन् 1997 में विहिप ने भोजशाला मुक्ति आंदोलन को अपनी केंद्रीय सूची में शामिल कर लिया। उसी दौरान तत्कालीन सरकार ने शुक्रवार को नमाज़ की अनुमति तो दे दी, लेकिन हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी, जिसने आंदोलन की आग को और भड़का दिया।
धर्मरक्षा समितियों का गठन: सन् 2000 में हिंदू जागरण मंच का गठन हुआ। इस संगठन ने गांव-गांव जाकर धर्मरक्षा समितियां बनाईं। अकेले धार जिले में 1334 समितियां एक्टिव थीं, जिससे 13 हजार से ज्यादा कार्यकर्ताओं का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हुआ।
महिलाओं की बड़ी भागीदारी: इस आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 7 फरवरी को आयोजित मातृशक्ति संगम में करीब 10 हजार महिलाओं ने भोजशाला मुक्ति का संकल्प लिया था।
जब केवल देहरी पूजन कर लौट आते थे लोग
एक समय ऐसा भी था जब दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हिंदू समाज के भोजशाला में प्रवेश और पूजा पर पूरी तरह पाबंदी थी। श्रद्धालु केवल बाहर देहरी (चौखट) की पूजा करके वापस लौट जाते थे। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी एक बार भोजशाला पहुंची थीं, लेकिन उन्हें भी बाहर से ही लौटना पड़ा था।
आंदोलन के बढ़ते दबाव को देखते हुए तत्कालीन केंद्रीय संस्कृति मंत्री भावना बहन चिखलिया ने 8 अप्रैल 2003 को एक आदेश जारी किया। इसके तहत हिंदू समाज को हर मंगलवार पूजा करने और साल में एक बार वसंत पंचमी पर सुबह से शाम तक विशेष पूजा करने की इजाजत मिली।
इस लंबे संघर्ष के दौरान आंदोलनकारियों को प्रशासनिक सख्ती का भी सामना करना पड़ा। हिंसक झड़पों में 39 कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हुए थे और दो लोगों की जान भी गई थी। हालात बिगड़ने पर 10 थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू तक लगाना पड़ा था।
फैसले के बाद भोपाल में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम
इसी लंबे इतिहास और हाल ही में आए कोर्ट के फैसले को देखते हुए पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है। शुक्रवार को भोपाल के पुराने शहर में जुमे की नमाज़ के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को बेहद कड़ा रखा गया था।


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