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2 जुलाई 2026:
डॉक्टर को समाज में भगवान का रूप माना जाता है। जो मरीज को एक नई उम्मीद, एक नया जीवन देते हैं। डॉक्टर सिर्फ बीमारियों का ही इलाज नहीं करते, बल्कि मरीजों को नई उम्मीद ,एक नया जीवन ,एक नया आत्मविश्वास भी देते हैं।  एक मुश्किल समय में जीवन को गति देते हैं। डॉक्टर के इन्हीं योगदान और समर्पण के रूप में हम डॉक्टर्स डे मनाते हैं। कल एक जुलाई को सभी ने  doctor’s day मनाया।

किंतु क्या हम जानते हैं कि डॉक्टर स्वयं किन परिस्थितियों से गुजर रहे होते हैं।  मरीजों का इलाज करते-करते वे स्वयं बीमार हो जाते हैं। किंतु उनका ध्यान रखने वाला कोई नहीं होता।
फेडरेशन ऑफ़ आल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने एक सर्वे किया, जिसमें यह खुलासा हुआ कि देश के करीब 88% रेजिडेंट डॉक्टर गहरे तनाव और बर्नआउट का शिकार है। लंबी ड्यूटी करने से नींद की कमी ,मानसिक तनाव के कारण हर  दूसरा डॉक्टर रेजिडेंसी छोड़ने का विचार बन चुका होता है। जिससे कई ने यह स्वीकार भी किया है आत्महत्या जैसे ख्याल उन्हें रोज आते हैं। वे अपने आप को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

देशभर के रेजीडेंट डॉक्टर 36-36 घंटे की लगातार ड्यूटी कर रहे हैं ‌ । इससे उन्हें नींद की कमी, मानसिक तनाव, गिरता स्वास्थ्य जैसी समस्याएं सामने आती है। यह डॉक्टर अपनी पूरी  नींद नहीं ले पाते। स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रख पाते। घर परिवार,समाज, दोस्त,सब पीछे छूट जाते हैं। काम का बोझ इतना होता है कि काम करने की कोई समय सीमा तय नहीं है । एक बार ड्यूटी आने के बाद ड्यूटी कब खत्म होगी ,यह निश्चित नहीं रहता।  कम से कम 24 घंटे अधिकतम 36 घंटे तक काम करना पड़ता है। ओपीडी में हर दिन हजारों मरीज आते हैं। मेडिसिन, गाईनी, एनेस्थीसिया ,सर्जरी जैसे विभागों में मरीजों की भीड़ लगी होती है।  जिससे काम का बोझ बहुत ज्यादा होता है । ओपीडी से लेकर वार्ड में जाकर भर्ती मरीजों को देखना होता है। अधिकतर अस्पताल रेजिडेंट डॉक्टर के भरोसे ही चलते हैं । कई बार नीट पीजी की परीक्षा स्थगित होने से यह स्थिति और विकराल हो जाती है।  परीक्षा लेट होने से, काउंसलिंग लेट होने से, दाखिल प्रक्रिया में देरी होने से डॉक्टरों की परेशानी और बढ़ जाती है। जिससे वे रेजिडेंसी छोड़ने के बारे में सोचते रहते हैं और खुद को नुकसान पहुंचानें की कोशिश करते हैं। 36 घंटे की लंबी ड्यूटी के बाद भी आराम करने को नहीं मिलता ,पर्याप्त भोजन नहीं मिलता । जिससे उनका स्वास्थ्य गिरता जाता है ।
36 – 36 घंटे की लगातार ड्यूटी:
एक सर्वे के अनुसार 50% रेजिडेंसी डॉक्टर हर सप्ताह 80 घंटे से अधिक और 20 %डॉक्टर 100 घंटे से ज्यादा काम कर रहे हैं। यह स्थिति बेहद गंभीर है और सुधार की जरूरत है।

नींद की कमी से कार्य क्षमता प्रभावित होती है:
डॉक्टर्स डे के अवसर पर देश में डॉक्टर के मानसिक स्वास्थ्य और उन पर बढ़ते काम के दबाव को लेकर चिंताएं सामने आई है।
एक सर्वे के अनुसार भारत में 811 मरीजों पर केवल एक डॉक्टर है। लंबी शिफ्ट से डॉक्टर की मानसिक सेहत पर असर पड़ता है।  मेडिकल संगठन ने पिछले वर्ष एक सर्वे किया, जिसमें सभी डॉक्टर्स की मानसिक सेहत पर एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है।
पिछले साल 20 सितंबर से 8 अक्टूबर के बीच 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2000 से ज्यादा मेडिकल प्रोफेशनल शामिल हुए और स्टडी में पता चला कि 85% डॉक्टर स्ट्रेस में है, 87% डॉक्टर  नींद की कमी से जूझ रहे हैं।
सोचिए जो डॉक्टर आपको यह मशवरा देते हैं कि अच्छी नींद आपकी सेहत के लिए जरूरी है।  वही डॉक्टर खुद नींद की कमी से जूझ रहे हैं।
करीब 70%  रेजिडेंट डॉक्टर्स की ड्यूटी की फिक्स हॉवर्स नहीं होते।  आने का समय होता है जाने का समय नहीं होता।
मेडिकल छात्रों ने अपने काम के माहौल को बताया बेहद टॉक्सिक:
40% से ज्यादा मेडिकल छात्रों ने अपने काम के माहौल को टॉक्सिक बताया है।  उन्होंने बताया कि उनको तनाव बहुत ज्यादा रहता है और इस तनाव का सबसे बड़ा कारण है काम का बोझ।
50% से ज्यादा डॉक्टर हफ्ते में 16 घंटे से भी ज्यादा काम करते हैं 15% वीकली वर्किंग आवर्स 80 घंटे से ज्यादा है ,यानी डॉक्टर का वर्किंग आवर्स बहुत अधिक है।
एक डॉक्टर अपने परिवार को दिन में सिर्फ 1 घंटे का समय दे पाता है। यदि हम किसी मनोचिकित्सक डॉक्टर के पास जाते हैं तो वह हर किसी को सलाह देता है कि अपने परिवार के साथ रहिए ,परिवार को समय दीजिए, जिससे स्वास्थ्य बेहतर रहता है। लेकिन एक डॉक्टर खुद अपने परिवार को कितना समय दे पाता है।
सर्वे की रिपोर्ट्स यह भी बताती है कि 10 में से सात मेडिकल प्रोफेशनल्स काम के दौरान खुद को सुरक्षित भी महसूस नहीं करते। तनाव के बीच रहते हुए यदि किसी मरीज के साथ कुछ ऊंच नीच या अनहोनी हो जाती है तो डॉक्टर पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ता है।


डॉक्टर बनना  बेहद मुश्किल है:
डॉक्टर बनना कोई आसान काम नहीं है। डॉक्टर बनने के लिए एंट्रेंस एग्जाम के लिए कठिन तैयारी करना। इसको पास करने के बाद 5 से 6 साल तक एमबीबीएस की पढ़ाई करना ,उसके बाद फिर 3 साल के अनगिनत एंट्रेंस एग्जाम के बाद एमडी या एमएस की 3 साल की कठिन पढ़ाई करना‌ । इसे क्लियर करने के बाद अगर स्पेशलिस्ट बना है तो डीम या एचसीएस करने के लिए और आगे 3 साल पढ़ाई करना। उसके लिए भी अनगिनत एंट्रेंस एग्जाम । और इन 12 साल में जो काम करने का माहौल है ,वह बेहद तनाव ग्रस्त है,चैलेंजिंग है,परेशानी भरा है, इमोशनली है ,सोशली और फाइनेंशली, साइकोलॉजिकल रूप से बेहद तनाव में काम करना भरा है। इन सबके बीच थीसिस भी लिखना है, रिसर्च भी करना है ,ड्यूटी भी करना है, आईसीयू की ड्यूटी भी करना है, ओटी आवर्स भी करना है और उसके बाद प्रेक्टिस करना है। यह काम आसान नहीं है।  यह ड्यूटी 36 घंटे से 48 घंटे नॉनस्टॉप ड्यूटी होती है।
इस एक्सट्रीम प्रेशर में काम करना जिंदगी और मौत से लड़ने के बराबर होता है । मानसिक तनाव बहुत अधिक होता है। सोशल लाइफ खत्म हो जाती है स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते। परिवार की समाज की खुशियों में शामिल नहीं हो पाते।
इसलिए हमें भी यह सोचना है कि डॉक्टर भी एक आम इंसान है ,वह कोई सुपर हीरो नहीं है। आज के समय में हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि डॉक्टर को भगवान मानने के बजाय डॉक्टर को इंसान समझें।  उनकी इच्छाओं का सम्मान करें।


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