भोपाल:
धर्म और आस्था की दृष्टि से यह समय बेहद खास और दुर्लभ संयोग लेकर आया है। पिछले महीने सत्रह मई से शुरू हुए एक महीने के अधिकमास का समापन पंद्रह जून को सोमवती अमावस्या के एक बड़े महासंयोग के साथ होने जा रहा है।
धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पंद्रह से लेकर उन्नीस जून तक के पांच दिनों में चार बड़े संयोग बनने जा रहे हैं। इस समय उनसठ दिनों का विशेष ज्येष्ठ महीना चल रहा है, जिसमें से अधिकमास के केवल तीन दिन ही बचे हैं। सोमवार को साल की पहली सोमवती अमावस्या होने के कारण इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य करने का बहुत बड़ा महत्व रहेगा।
इसके अगले ही दिन यानी सोलह जून से शुद्ध ज्येष्ठ मास की शुरुआत हो जाएगी और उन्नीस जून से देश भर में एक बार फिर शादियों और मांगलिक कार्यों की धूम देखने को मिलेगी। इससे पूर्व ऐसा संयोग वर्ष दो हजार तेईस में बना था।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अभी तक शहर के तमाम मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान और साधनाएं चल रही थीं। अधिकमास के शुरू होते ही विवाह और यज्ञोपवीत जैसे सभी मांगलिक कार्य पूरी तरह से बंद हो गए थे, जिनकी शुरुआत अब इस महीने के समाप्त होते ही होने जा रही है।
जानकारों के अनुसार शुद्ध मास और अधिकमास के बीच का अंतर बहुत सीधा है। शुद्ध मास सूर्य संक्रांति के अनुसार बिल्कुल सामान्य रूप से आता है, जबकि अधिकमास एक अतिरिक्त जोड़ा गया महीना होता है। चूंकि इस महीने को स्वयं भगवान विष्णु ने अपना नाम दिया है, इसीलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि इस महीने में किए गए जप, तप, दान और व्रत का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। जहां शुद्ध मास सामान्य कार्यों के लिए बिल्कुल सही माना जाता है, वहीं अधिकमास को विशेष रूप से आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस दौरान लोग गंगा स्नान, जल दान और प्याऊ निर्माण जैसे पुण्य काम करते हैं।
अधिकमास में श्रीमद्भागवत कथा सुनने का भी विशेष महत्व होता है और इसी महीने में गंगा दशहरा व निर्जला एकादशी जैसे बड़े व्रत भी आते हैं, जिन्हें बेहद फलदायी माना जाता है।
शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति पूरे महीने नियम-धर्म का पालन नहीं कर पाया है, तो वह पुरुषोत्तम मास के अंतिम तीन दिनों में भक्ति करके पूरे महीने की पूजा और साधना के समान पुण्य फल प्राप्त कर सकता है। इन अंतिम तीन दिनों में भगवान विष्णु की विशेष पूजा, दान-पुण्य और नाम का जाप करना बहुत ही उत्तम माना गया है।
इसके अलावा, इन दिनों में प्रतिदिन शाम के समय तुलसी माता के पौधे के पास, मंदिर में, पीपल के पेड़ के नीचे या अपने घर के मुख्य दरवाजे पर पांच दीपक अवश्य जलाने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। इन पवित्र दिनों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करना भी बहुत लाभकारी होता है, विशेषकर इसके चौदहवें और पंद्रहवें अध्याय का पाठ अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इस समय अवधि में किए गए किसी भी तरह के दान को उत्तम और पुण्य देने वाला माना जाता है।
अधिकमास की समाप्ति के बाद उन्नीस जून से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाएगी, लेकिन यह सिलसिला बहुत लंबे समय तक नहीं चलेगा। बारह जुलाई के बाद शुभ कार्यों पर फिर से एक बार ब्रेक लग जाएगा। उन्नीस जून से पंद्रह जुलाई के बीच विवाह, मुंडन, उपनयन, नामकरण, अन्नप्राशन, गृह प्रवेश और नए व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्यों के लिए कई शुभ मुहूर्त रहेंगे। बारह जुलाई तक शादियों के अच्छे मुहूर्त हैं, लेकिन इसके बाद पच्चीस जुलाई से चातुर्मास शुरू होने के कारण अगले चार महीनों के लिए शादियों और अन्य बड़े मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी।
आने वाले दिनों की कुछ प्रमुख तिथियों की बात करें तो पंद्रह जून को सोमवती अमावस्या है, सत्रह जून को रंभा तीज मनाई जाएगी, अट्ठारह जून को विनायकी चतुर्थी होगी, तेईस जून को महेश नवमी, पच्चीस जून को एकादशी, सत्ताइस जून को प्रदोष व्रत और उनतीस जून को ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा होगी।
विवाह के शुभ मुहूर्तों को देखा जाए तो अधिकमास खत्म होने के बाद जून महीने में उन्नीस से लेकर उनतीस जून तक लगातार शादियों के मुहूर्त बने हुए हैं। इसके बाद जुलाई महीने में एक, दो, छह, सात, आठ, ग्यारह और बारह जुलाई को विवाह के अंतिम शुभ मुहूर्त रहेंगे। इन तारीखों के बाद सीधे बीस नवंबर से शादियों के नए मुहूर्त शुरू होंगे।


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