16 मई 2026
इंदौर:
मध्य प्रदेश के धार में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में हाई कोर्ट का बड़ा फैसला आ चुका है। कोर्ट ने अपने इस फैसले में माना है कि भोजशाला का वजूद वहां मस्जिद बनने से बहुत पहले का है। कोर्ट का यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई की सर्वे रिपोर्ट और कई ऐतिहासिक सबूतों पर आधारित है। आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि कोर्ट ने अपने फैसले का मुख्य आधार किन बातों को बनाया है।
एएसआई की जांच में क्या-क्या मिला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया यानी एएसआई के सर्वे को सबसे बड़ा आधार माना है।
इस सर्वे के दौरान जो अहम जानकारियां और सबूत सामने आए, वो इस प्रकार हैं
98 दिन तक चले एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे में भोजशाला परिसर के भीतर से कई प्राचीन मूर्तियां, खंभे, पुराने सिक्के और संस्कृत भाषा में लिखे शिलालेख मिले हैं।
साल 1902 में हुए एएसआई के पुराने सर्वे के सबूतों को भी कोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण और प्रामाणिक माना है।
पूरे परिसर की बनावट और आर्किटेक्चर को देखने के बाद यह पाया गया कि इसकी स्थापत्य शैली पूरी तरह से हिंदू मंदिरों जैसी ही है।
सर्वे के दौरान भोजशाला परिसर में 106 खंभे और 82 स्तंभ मिले हैं, जिनकी बनावट मंदिरों के खंभों से मेल खाती है।
संस्कृत के शिलालेख और प्राचीन मंत्र
कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया है कि परिसर के भीतर से एएसआई को 150 से भी ज़्यादा संस्कृत और प्राकृत भाषा के प्राचीन शिलालेख मिले हैं। इन प्राचीन पत्थरों और शिलालेखों पर सरस्वती नमः और ॐ नमः शिवाय जैसे पवित्र मंत्र और श्लोक साफ-साफ लिखे हुए पाए गए हैं, जो इसके मंदिर होने का मजबूत दावा पेश करते हैं।
इतिहास की किताबों और गजेटियर का हवाला
हाई कोर्ट ने केवल जमीन से निकले सबूतों को ही नहीं, बल्कि पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों को भी अपने फैसले का आधार बनाया है। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया सहित कई अन्य पुरानी ऐतिहासिक किताबों के हवाले से कोर्ट ने माना कि यह स्थान राजा भोज से जुड़ा हुआ है। कोर्ट का कहना है कि हालांकि गजेटियर अकेले अंतिम फैसला तय नहीं करते, लेकिन वे सहायक सबूत के रूप में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं।
मस्जिद निर्माण के दावों को कोर्ट ने नकारा
मुस्लिम पक्ष की ओर से यह दलील दी जा रही थी कि मस्जिद का निर्माण खाली जमीन पर हुआ था। लेकिन कोर्ट ने हदीस का हवाला देते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भोजशाला के पत्थरों का इस्तेमाल करके या जबरन किसी की जमीन पर मस्जिद का निर्माण नहीं किया जा सकता।
मौजूदा ढांचे को देखकर कोर्ट ने माना कि पुराने मंदिर के हिस्सों, जैसे कि उसके पुराने खंभों, मूर्तियों, बीम, खिड़कियों और शिलालेखों को काटकर या उनमें बदलाव करके ही इस नई संरचना को तैयार किया गया था।
अयोध्या के फैसले को बनाया नजीर
दिलचस्प बात यह है कि हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला का फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध अयोध्या फैसले (राम मंदिर मामले) का भी हवाला दिया। हाई कोर्ट ने इस केस में महाधिवक्ता प्रशांत सिंह द्वारा पेश किए गए तर्कों और अयोध्या मामले की नजीर को स्वीकार किया। इसके साथ ही कोर्ट ने साल 2003 के उस पुराने आदेश को भी सही ठहराया, जिसके तहत अब यहां नमाज़ नहीं बल्कि 24 घंटे सिर्फ पूजा-अर्चना का प्रावधान रहेगा।
इस तरह वैज्ञानिक सर्वे, इतिहास के पन्नों, पत्थरों पर उकेरे गए मंत्रों और पुराने कानूनी फैसलों को जोड़कर हाई कोर्ट ने इस ऐतिहासिक विवाद पर अपना यह बड़ा निर्णय दिया है।


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