29 अगस्त 2026 :
खबर प्रधान डेस्क:
हम भारतीयों की स्कीन डार्क है अतः हमें विटामिन डी की ज्यादा जरूरत होती है। विटामिन-डी वसा में घुलनशील प्रो-हार्मोन का एक समूह है। ये दो प्रकार के होते हैं। विटामिन डी-2 या अर्गाकेलसीफेरोल और विटामिन डी-3 या कोलेकेलसीफेरोल। यह फेट्स में घुलनशील विटामिन है। सूरज की पराबैंगनी किरणें, विटामिन-डी युक्त फूड्स या सप्लीमेंट्स से मिलने वाला विटामिन-डी लीवर में पहुंचता है और रसायन में बदलकर शरीर के अन्य अंगों को मिलता है। यह आंतों से कैल्शियम को सोखकर हड्डियों में पहुंचाता है।

क्यों होती है विटामिन-डी की कमी ?
शाकाहारी लोगों में विटामिन-डी की मात्रा कम होती है। इसके विपरीत जो लोग समुद्री इलाके में रहते है और  सेल्मोन मछलियों का सेवन करते हैं, उनमें विटामिन-डी की कमी नहीं होती। हमारे देश की शहरी आबादी में विटामिन डी की कमी का प्रमुख कारण है -धूप से दूरी, घरों में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचना, छतरी और सन स्क्रीन का ज्यादा उपयोग, शरीर को पूरी तरह ढंक लेने वाले वस्त्र और मोटापा।

विटामिन डी के स्रोत:
सूरज की किरणें। एक हफ्ते में कम से कम 2-3 बार 5 से 10 मिनट सूरज की किरणों के सम्पर्क में रहना चाहिए। अंडे की जर्दी, मछली के जिगर का तेल, विटामिन डी युक्त फोर्टीफाइड डेयरी उत्पाद और अनाज, मशरूम, सप्लीमेंट्स आदि।

विटामिन डी अधिक हो तो भी है खतरा:
विटामिन डी की कमी जहां नुकसान देती है वहीं इसका स्तर अधिक होने पर शरीर के विभिन्न अंगों जैसे गुद्दों, हृदय, रक्त वाहिकाओं और अन्य स्थानों में पथरी हो सकती है। साथ ही कोलेस्ट्रॉल और रक्तचाप का बढ़ जाना या हृदय संबंधी रोग। इसके साथ ही चक्कर आना, कमजोरी लगना और सिरदर्द आदि भी हो सकता है।

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