25 अप्रैल 2026
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि एक महिला की अपनी मर्जी (प्रजनन स्वायत्तता) सर्वोपरि है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला, चाहे वह नाबालिग ही क्यों न हो, उसकी इच्छा के खिलाफ उसे गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
15 साल की नाबालिग को मिली गर्भपात की इजाजत
यह फैसला एक 15 साल की नाबालिग लड़की के मामले में आया है। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की इच्छा को सबसे ऊपर रखते हुए उसे सात महीने की गर्भावस्था समाप्त करने (अबॉर्शन) की अनुमति दे दी है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा कि इस मामले में गर्भवती महिला की इच्छा और उसका निर्णय सबसे महत्वपूर्ण है, न कि उस बच्चे का जिसे अभी जन्म लेना है।
संविधान देता है निजता और शरीर पर अपना अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ अहम टिप्पणियां की हैं:
1. शरीर से जुड़े फैसले लेना हर व्यक्ति का अधिकार है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता (Privacy) का हिस्सा है।
2. अनचाहे गर्भ को जबरन जारी रखने के लिए कहना किसी भी महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकता है।
3. अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसे संवेदनशील मामलों में महिला के नजरिए से तथ्यों को देखें।
अदालत ने क्यों दिया यह आदेश?
सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पीड़ित नाबालिग लड़की इस कदर मानसिक दबाव में थी कि उसने दो बार अपनी जान लेने की कोशिश भी की थी। कोर्ट ने माना कि वह बहुत बुरे मानसिक दौर से गुजर रही है। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को मेडिकल जोखिमों के बारे में भी बताया कि इस समय गर्भपात कराने से मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है, लेकिन कोर्ट ने सभी परिस्थितियों को देखते हुए नाबालिग के हितों में गर्भ समापन की अनुमति देना ही उचित समझा।
बिना राहत के खतरनाक रास्ते चुन सकती हैं महिलाएं
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कानूनी तौर पर समय सीमा समाप्त होने के बाद अदालतों ने राहत देना बंद कर दिया, तो लोग मजबूर होकर गैरकानूनी और खतरनाक तरीके अपना सकते हैं। इससे महिलाओं की जिंदगी और भी ज्यादा खतरे में पड़ सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनचाहे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना महिला के हितों को नजरअंदाज करना है।
इस फैसले को महिलाओं के शारीरिक अधिकारों की दिशा में एक बड़ी जीत माना जा रहा है।


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