7 मई 2026

नई दिल्ली:
विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजों ने एक चौंकाने वाला रुझान सामने रखा है। लोकतंत्र में ‘नोटा’ (None of the Above) यानी किसी भी उम्मीदवार को पसंद न करने का विकल्प अब एक बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। कई राज्यों में तो स्थिति यह है कि नोटा को मिलने वाले वोट कई पुराने और स्थापित राजनीतिक दलों के कुल वोटों से भी कहीं ज्यादा हैं।
प्रेस रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में वामपंथी दलों और कुछ क्षेत्रीय पार्टियों की तुलना में जनता ने नोटा का बटन दबाना ज्यादा बेहतर समझा। यह दिखाता है कि मतदाता अब उम्मीदवारों के चयन को लेकर ज्यादा सतर्क और असंतुष्ट हैं।
पश्चिम बंगाल और असम के चौंकाने वाले आंकड़े
पश्चिम बंगाल में चुनावी समीकरणों ने सबको हैरान कर दिया है। यहाँ सीपीआईएम को छोड़कर अधिकांश वामपंथी दलों से कहीं ज्यादा वोट नोटा के खाते में गए हैं। आंकड़ों की बात करें तो:
पश्चिम बंगाल में नोटा पर करीब 4,94,932 वोट पड़े। इसकी तुलना में कई छोटे और मध्यम दल बेहद कम वोट हासिल कर पाए। उदाहरण के तौर पर, कुछ प्रमुख दलों को महज 0.18 प्रतिशत या उससे भी कम वोट मिले, जबकि नोटा का ग्राफ उनसे काफी ऊपर रहा।
असम में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही। वहाँ वामपंथी दलों को नोटा से कम वोट मिले हैं। असम विधानसभा चुनाव में नोटा पर कुल 2,67,191 वोट गिरे, जो कुल मतदान का 1.23 प्रतिशत है। यहाँ सीपीआईएम और एआईयूडीएफ जैसे दलों की तुलना में मतदाताओं ने नोटा को प्राथमिकता दी।
दक्षिण भारत में भी नोटा का प्रहार
दक्षिण भारतीय राज्यों—तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में भी मतदाताओं ने अपनी नाराजगी नोटा के जरिए जाहिर की है।
1. तमिलनाडु: यहाँ के स्थापित दलों के प्रत्याशियों से नाराज मतदाताओं ने नोटा का जमकर इस्तेमाल किया। यहाँ करीब 1,99,801 वोट नोटा को मिले।
2. केरल: इस राज्य में नोटा पर 1,23,067 वोट पड़े। यह संख्या कई छोटे राजनीतिक दलों के वोट बैंक से कहीं अधिक है।
3. पुडुचेरी: यहाँ भी कुल पड़े वोटों में से 6,633 मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना।
पांच राज्यों का कुल गणित
अगर हम इन पांचों चुनावी राज्यों को मिलाकर देखें, तो नोटा की शक्ति साफ नजर आती है:
पश्चिम बंगाल: 4,94,932 वोट
असम: 2,67,191 वोट
तमिलनाडु: 1,99,801 वोट
केरल: 1,23,067 वोट
पुडुचेरी: 6,633 वोट
कुल मिलाकर इन पांच राज्यों में लगभग 10 से 11 लाख मतदाताओं ने किसी भी पार्टी के उम्मीदवार को अपना वोट देने लायक नहीं समझा।
विशेषज्ञों की राय
जानकारों का मानना है कि नोटा को मिलने वाले इतने अधिक वोट राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी की तरह हैं। यह इस बात का संकेत है कि जनता अब केवल चेहरे देखकर वोट नहीं दे रही, बल्कि काम और साख को परख रही है। जब मतदाता को कोई भी विकल्प सही नहीं लगता, तो वह अपनी नाराजगी नोटा के जरिए दर्ज कराता है। यह स्थिति राजनीतिक दलों पर बेहतर और साफ छवि वाले उम्मीदवार उतारने का दबाव बढ़ाती है।