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28 मई 2026
धार:
मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर धार में भोजशाला के बाद अब एक और ऐतिहासिक स्थल को लेकर हलचल तेज हो गई है। बुधवार को धार में धार्मिक आस्था, इतिहास और आंदोलन की गूंज एक बार फिर सुनाई दी। ‘हिंदू फ्रंट फार जस्टिस’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री विशेष रूप से लखनऊ से धार पहुँचीं। उन्होंने सबसे पहले ऐतिहासिक भोजशाला में जाकर मां वाग्देवी के दर्शन किए, वहां कमल के फूल अर्पित किए, चुनरी चढ़ाई और महाआरती उतारी। इसके बाद वह सीधे विजय मंदिर पहुँचीं, जहाँ उन्होंने मंदिर के गर्भगृह, प्राचीन खंभों और वहां बनी आकृतियों का बेहद बारीकी से निरीक्षण किया।

भोजशाला के बाद विजय मंदिर बनेगा अगला केंद्र
रंजना अग्निहोत्री ने मीडिया से बातचीत में साफ शब्दों में कहा कि भोजशाला में लंबी कानूनी लड़ाई, एएसआई (ASI) के सर्वे और बसंत पंचमी पर पूजा का अधिकार मिलने जैसी बड़ी सफलताओं के बाद अब भोजशाला धीरे-धीरे अपने पुराने वैभव की तरफ लौट रही है। उन्होंने ऐलान किया कि भोजशाला के बाद अब उनके आंदोलन का अगला मुख्य केंद्र धार का विजय मंदिर होगा। विजय मंदिर को भोजशाला की स्थापत्य परंपरा का ही एक हिस्सा बताते हुए उन्होंने दावा किया कि यहाँ के खंभे, पिलर, नक्काशी और शिल्पकला पूरी तरह से भोजशाला से मेल खाती है। उन्होंने कहा कि अगले छह महीनों के भीतर विजय मंदिर के मूल स्वरूप की पुनर्स्थापना के लिए एक नई कानूनी और वैचारिक रणनीति तैयार की जाएगी और इस आंदोलन को और तेज किया जाएगा। साथ ही यहाँ भी वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कराने की मांग की जाएगी।

क्या है विजय मंदिर का इतिहास और वर्तमान स्थिति?
धार में स्थित विजय मंदिर को ऐतिहासिक रूप से राजा भोज की विजय स्मृति से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, बाद के दौर में इतिहास के उतार-चढ़ाव के कारण इस स्थान को ‘लाट मस्जिद’ या ‘स्तंभ मस्जिद’ के नाम से भी पुकारा जाने लगा। वर्तमान में यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की देखरेख और निगरानी में है। मौजूदा व्यवस्था के अनुसार, यहाँ हिंदू पक्ष को साल में केवल एक बार यानी दशहरे के दूसरे दिन पूजा करने की अनुमति मिलती है, जबकि मुस्लिम पक्ष यहाँ ईद के मौके पर नमाज अदा करता है।
इतिहासकारों और एएसआई के दस्तावेजों के मुताबिक, भले ही यह स्थान वर्तमान में लाट मस्जिद के नाम से दर्ज है, लेकिन इसकी पूरी वास्तुकला और निर्माण शैली परमारकालीन राजाओं के समय की है। इतिहासकारों का मानना है कि यह मूल रूप से ‘विजय कीर्ति मंदिर’ या एक प्राचीन ‘सूर्य मंदिर’ रहा होगा। आज भी इस परिसर के भीतर भगवान वराह की आकृतियां, प्राचीन शिल्प और कमल के फूलों पर आधारित सुंदर नक्काशी साफ देखी जा सकती है, जो पूरी तरह मंदिर वास्तुकला का हिस्सा हैं।
मान्यता है कि मालवा के प्रतापी राजा भोज ने जब दक्षिण भारत के तेलंगाना क्षेत्र में एक बड़ी जीत हासिल की थी, तो उस विजय स्मारक के रूप में उन्होंने यहाँ एक विशाल लौह स्तंभ (लाट) स्थापित करवाया था। यह ऐतिहासिक स्तंभ लगभग 40 से 45 फीट ऊंचा बताया जाता है, जो वर्तमान में तीन हिस्सों में टूटकर इसी परिसर में मौजूद है। प्राचीन काल में युद्धों में मिली जीत की याद को हमेशा ताजा रखने के लिए ऐसे विजय स्तंभ स्थापित करने की एक मजबूत परंपरा रही है, जिसका यह मंदिर जीता-जागता गवाह है।


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